Friday, November 17, 2017

शादी में जरुर आना

शादी में जरुर आना
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पहले मुझे लगा यह है बदरी की दुल्हनिया टाइप की मूवी होगी और शुरुवात में थोड़ी वैसी लगी भी मगर धीरे-धीरे शादी में जरुर आना फिल्म अपने उनवान पर चढ़ी और फिल्म का तेवर और कलेवर दोनों ही बदल गए. चूंकि मैं उत्तर प्रदेश का बाशिंदा हूँ इसलिए पीसीएस की पद प्रतिष्ठा को ठीक से समझता हूँ. फिल्म का कथानक इलाहाबाद को केंद्र में रखकर बुना गया है और यूपी में इलाहाबाद सिविल सर्विस की तैयारी करने वालों का मदीना रहा है.
शादी में जरुर आना मध्यमवर्गीय चेतना के जटिल बुनावट को सिनेमेटिक फॉर्म में दर्शको के समक्ष रखने की एक ईमानदार कोशिश करती है. सपनें,सिविल सर्विस, दहेज़, लिंग भेद, नैतिकता,प्रतिशोध और शो ऑफ़ आदि जैसे तत्वों ने फिल्म की कहानी के कहन को आसान और प्रभावी बनाया है.
सत्येन्द्र ऊर्फ सत्तू और आरती शुक्ला के प्रेम को समझने के लिए आपको अपनी स्टूडेंट लाइफ में बार-बार झांकना पड़ता है और फिल्म आपको अतीत में ले जाती है जहां किसी के लिए खुद को सिद्ध करना था या किसी के लिए खुद सिद्ध होना था. प्रेम मे विश्वास एक अनिवार्य तत्व है मगर जब सामने एक अप्रत्याशित सपना आकर खड़ा हो जाए तो फिर आपका विवेक भी साथ छोड़ देता है उसके बाद चीज़ें अपनी दिशा खुद करने लगती है फिल्म में सपना ऐसे ही अचानक सामने आता है और फिल्म की शुरुवात से चल रही एक गुदगुदी को तनाव में बदल जाता है.
प्रेम में रिजेक्शन किसे अच्छा लगता है मगर मुझे इस फिल्म में नायक का रिजेक्शन नही लगा वह दरअसल हालात का रिजेक्शन था जो अप्रत्याशित ढंग से घटित होकर चला गया. सत्तू की सादगी और आरती का चुलबुलापन फिल्म के पूर्वाद्ध में बहुत हंसाता है मगर बाद में दोनों को देखकर लगने लगता है क्या ये वही लव बर्ड है?
शादी में जरुर आना एक साफ़ सुथरी एक रेखीय फिल्म है हाँ फिल्म कुछ अति भी है जैसे डीएम बने सत्येन्द्र मिश्र का छापे के दौरान खुद तोड़-फोड़ करना मुझे नही लगता कोई आई ए एस अधिकारी खुद इस तरह से करता होगा भले ही उसकी निजी खुन्नस क्यों न रही हो फिल्म की कहानी में एक यह झोल मुझे  जरुर लगा इसके अलवा मेरा इंतकाम देखोगी..गाना भी प्रेम में अवांछित हिंसा का प्रतिनिधत्व करता है मगर रोचक बात है इस गाने पर फिल्म में खूब सीटियाँ बजी इसका मतलब है भारतीय पुरुष दर्शक अब भी दिल में गुबार लेकर जीता है जो नही मिल सका उसे एक बार सबक जरुर सिखाना है ये अमूमन एक मनोवृत्ति है हालांकि मैं इसे अनुचित मानता है.
फिल्म की कहानी कमल पांडे ने बहुत बढ़िया और गठन के साथ लिखी है फिल्म देखतें हुए आप फिल्म से बंधे रहते है और फिल्म आपको एक पल के लिए भी बोर नही करती है फिल्म में गाने भी अच्छे है.
शादी में जरुर आना आपको प्रेम की एक रेखीय दुनिया के आंतरिक उथल-पुथल और रिश्तों के संघर्षो की दुनिया से रूबरू कराती है और मनुष्य के अंदर उपेक्षा और तिरस्कार से उपजे प्रतिशोध को देखने का अवसर देती है मगर फिल्म देखकर आप अंत में तय कर पाते है कि वास्तव में कोई गलत या सही नही होता है बस वक्त और हालत आदमी को मजबूर कर देते है.
शादी में जरुर आना एक निमंत्रण है या धमकी ये आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा मेरे ख्याल से सर्दी के इस मौसम में ऐसी शादी में एक बार जरुर जाना चाहिए इसी बहाने आपको अपनी कहानी को रिमाइंड करने का मौक़ा मिलेगा जो भले ही ऐसी न हो मगर उसके कुछ तार इससे जरुर मिलते जुलते होंगे बशर्ते आपने किसी से सच्चा प्रेम किया हो.

© डॉ. अजित 

Monday, November 13, 2017

करीब-करीब सिंगल

करीब-करीब सिंगल
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करीब-करीब को जोड़कर मैं तकरीबन शब्द बनाता हूँ. यह मेरी कोई मौलिक खोज नही है प्रचलन के लिहाज़ भाषा वैज्ञानिक इस पर बढ़िया प्रकाश डाल सकते है, मगर तकरीबन शब्द मुझे यहाँ अनुमान की आखिरी दहलीज़ पर छोड़ आता है जहां मैं मान लेने की स्थिति में खुद को पाता हूँ. मान लेना वैसे गणित के सवाल हल करने में मदद करता है, मगर जिंदगी का भी अपना एक गणित है और उस गणित में हमें बहुत कुछ वो मान लेना होता है जो असल में होता नही है या होता है तो हमें हासिल नही होता है या हासिल होकर भी हमारा नही होता है. मैं बातों को अधिक उलझाने की कोशिश नही करूंगा ये काम असल में जिंदगी का है. मैं तकरीबन सिंगल होने को इस फिल्म के जरिए समझने की एक ईमानदार कोशिश जरुर करूंगा शायद मैं फिल्म के उतना करीब पहुँच पाऊं जहां से सिंगल और मिंगल दुनिया का महीन भेद साफ-साफ़ दिखाई पड़ता है.
करीब-करीब सिंगल देखने के पीछे जाहिरी तौर पर इरफ़ान खान का ऑरा मुझे सिनेमा हाल तक ले गया था मगर फिल्म देखते हुए मैंने महसूस किया कि यह केवल इरफ़ान खान की फिल्म नही है बल्कि इस फिल्म एक करीब का सिरा इरफ़ान के हाथ में और दुसरे करीब का सिरा पार्वती थामे हुए है और इन दोनों के मध्य सिंगल होने और न होने का एक महाभाष्य टंगा हुआ है जिसका अलग-अलग पाठ हो सकता है.
योगी और जयश्री टीके मनुष्य के एकांत के दो गहरे प्रतीक है उनका जीवन एकरस से भरा दिखता जरुर है मगर असल में उनके आंतरिक जीवन में एक अमूर्त निर्वात भी पसरा हुआ है. यह फिल्म हमें यह बताती है कि स्त्री और पुरुष दोनों स्वतंत्र अस्तित्व होते हुए भी चेतना और संवेदना के स्तर पर एक दुसरे में किस कदर गुंथे हुए भी है.
सिंगल या अकेला होना आपका चुनाव हो सकता है मगर यह त्रासद बिलकुल नही होता है, यह त्रासद जब लगने लगता है जब समाज के मानको पर आपको जज किया जाने लगता है.
दरअसल मनोवैज्ञानिक तौर पर प्रत्येक मनुष्य की दो ज्ञात दुनिया होती है एक वह जो बाहर की दुनिया को दिखती है और एक वह जिसके बारें में केवल आप जानते है. आपकी नितांत ही निजी दुनिया में निजी दुःख,छूटे सपनें और अपने, छोटे-छोटे सुख दुबके रहते है. अंदर और बाहर की दुनिया के संघर्ष मनुष्य के सुख और दुःख का मानकीकरण करते है.
योगी शायर है और रूह की बेचैनी उसे नियामत के तौर पर हासिल है जयश्री हेल्थ सेक्टर की प्रोफेशनल है, विडो होने के कारण सिंगल है. देखा जाए तो दोनो एकदम विपरीत ध्रुव है मगर विज्ञान भी मानता है कि असंगतता के मध्य एक गहरा आकर्षण भी छिपा होता है रिश्तों का यह चुम्बकीय क्षेत्र फिल्म में उन्हें कभी नजदीक तो कभी दूर करता रहता है.
करीब-करीब सिंगल की सबसे बड़ी यूएसपी यह है कि फिल्म का बड़ा हिस्सा एक यात्रा में घटित होता है इसी कारण हम सिंगल और मिंगल दोनों की यात्रा के साक्षी बन पाते है. योगी का किरदार बहुत अच्छे ढंग से स्थापित किया गया है वो फक्कड़,फकीर,मनमौजी है दिल से जैसा महसूस करता है वैसा उसका बयान भी कर देता है. जयश्री के व्यक्तित्व पर सोशल कंडीशनिंग पर प्रभाव साफ़ तौर पर दिखते है. एक उम्र अकेले बिताने के बाद उसके अपने डर,असुरक्षाएं और सीमाएं है जो प्रेम के प्रवाह में कभी आड़े आती है तो कभी उसे सावधान भी करती है.
योगी और जयश्री दोनों का एक अतीत है मगर दोनों के अतीत का ट्रीटमेंट एकदम अलग है योगी के अतीत ने उसको मुक्त किया है जबकि जयश्री का अतीत उसके इर्द-गिर्द एक स्मृतियों का घेरा हमेशा तैयार रखता है. जयश्री की यात्रा खुद और खुद के अतीत से भागने से आरम्भ होकर अपने डर और संशयों की मुक्ति पर जाकर खत्म होती है और योगी की यात्रा जैसे अचानक से खत्म हो जाती है और ये अचानक से खत्म होना उसके जीवन का सबसे गहरा बोध बन जाता है.
करीब-करीब सिंगल देखकर हम यह जान पातें है कि प्रेम के लिए सहमत होना अनिवार्य नही होता है और प्रेम की शुरूवात गल्प से आरम्भ होकर जादुई यथार्थ पर खत्म हो जाए तो फिर हम कह सकते है कि एक सफ़र मुक्कमल हुआ.
यह फिल्म गुदगुदाती है और हमें समझाती भी है फिल्म देखते हुए आप फिल्म के दर्शक से अधिक सहयात्री अधिक होते है इसलिए इसके अलग अलग पड़ाव पर आपके अनुभव भी अलग होते है मसलन ऋषिकेश में आप सोच रहे होते है अब क्या होगा और सिक्किम में आपको पता नही होता है कि अब क्या होगा.
मनुष्य के निजी दुःख,डर,स्मृतियाँ और उनसे निर्मित आदतें मनुष्य की एक अलग दुनिया का सृजन करती है जहां की नीरवता में आप तभी दखल बरदाश्त करना पसंद करते है जब कोई ऐसा मिल जाए जिसे आप बिना किसी ज्ञात कारण के भी पसंद करने लगे हो. करीब-करीब सिंगल देखते वक्त अपने अपने आसपास ऐसे किरदारों की गिनती शुरू कर देते है जिनके शक्ल और अक्ल योगी और जयश्री से मिलती हो. यही फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है.
इरफ़ान की आँखों और पार्वती की नाक के लिए करीब-करीब सिंगल जरुर देखी जानी चाहिए भले ही आप सिंगल है या मिंगल.

©डॉ.अजित


Monday, September 25, 2017

अंजलि पाटिल: खत

अंजलि पाटिल,
तुम्हें पहले चक्रव्यूह में देखा था और अब न्यूटन में देखा। नक्सलवाद से मुझे कोई सैद्धांतिक लगाव नही है और न ही मैं हिंसा का मार्ग उचित मानता हूँ।मगर तुम जब वंचितों की दुनिया का आंतरिक सच डायलॉग डिलीवरी के माध्यम से सिनेमा में रचती हो तो मेरा कवि हृदय नागरिक शास्त्र और लोक प्रशासन का विद्यार्थी बन वास्तव में इस जन और जंगल की समस्या को समझने के लिए आतुर हो जाता है।

मैं जानता हूँ तुम एक मॉडल हो मगर व्यवस्था से पीड़ित किरदार को निभाते वक्त तुम्हारी अभिनय क्षमता बहुत निखर कर सामने आती है। मैं तुम्हें किसी खास रोल में टाइप्ड नही कर रहा हूँ क्योंकि तुम्हारा काम है एक्टिंग करना फिर भी तुम्हारे जरिए एक ज्वलंत समस्या का बेहद वास्तविक चित्र बनता है।
न्यूटन फ़िल्म में तुम मलका नाम की बीएलओ बनी हो और तुम्हारी आँखों मे उम्मीद का जो आकाश दिखाई देता है उसके समक्ष यथार्थ की जमीन थोड़ी पड़ जाती है।

दरअसल, न जाने कब से मनुष्य की एक लड़ाई खुद से चल रही है और उसके टूल बहुत सी चीजें बनती है धर्म,अर्थ,राजनीति और सत्ता के केंद्र मिलकर मनुष्य को मनुष्यता के खिलाफ खड़ा करते है ये लड़ाई अभी और लंबी चलेगी मनुष्य की हताशा की अभी अतिरेक रूप से परीक्षा ली जानी बाकि है।

दंडकारण्य के जंगल मे तुम्हारे जरिए मैं मनुष्य की उस हताशा को पढ़ने की कोशिश करता हूँ जो आदिवासियों के चेहरों पर पुती है मैं पैरा मिलिट्री फोर्स के जवानों के चेहरों से भी गुजरता हूँ वे भी दरअसल सिस्टम का एक टूल भर बन गए है मनुष्य अपनी नस्ल से लड़ रहा है और क्यों लड़ रहा है इसका जवाब वे जरूर जानते है जिनके पास सवालों के जवाब देने की कोई बाध्यता नही है।

फिलहाल, तुम्हारी हंसी में कंकर सी पिसी उदासी को देखकर मैं एक अंतहीन इंतजार के कमरे में पसर गया हूँ जहां मुझे लगता है कि एकदिन सब ठीक हो जाएगा। हालांकि सब ठीक होना अक्सर ठीक होना नही होता है मगर मैं चाहता हूँ जल,नदी,जंगल, झरने,हवा आदि पर मनुष्य अपनी दावेदारी समाप्त कर दें और उन्हें अपने नैसर्गिक रूप से रहने दिया जाए। यदि मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य का भला करना चाहता है तो उसके पीछे नीति की दासता शामिल न हो वो उनके उत्थान के नाम पर जड़ो से काटने का षडयंत्र न हो।

ये सब मेरे मन के सन्ताप है जो मैं तुम्हारे जरिए कह पा रहा हूँ न्यूटन फ़िल्म में तुम एक जगह कहती हो कि आप हमसे कुछ घण्टे की दूरी पर रहते है मगर हमारे बारें में कुछ नही जानते है। यह डायलॉग इस सदी का सच है हम घण्टे ही मिनटों की दूरी पर रहने के बावजूद किसी के बारे में कुछ नही जानते है।

दरअसल हम खुद को भी पूरी तरह नही जानना चाहते है क्योंकि फिर हमें अपने मनुष्य होने पर कुछ कुछ अंशो में शर्मिंदगी जरूर होने लगेगी।
खैर, मैं विषयांतर करके असंगत बातें करने के लिए जाना जाता हूँ इसलिए मैं ताप के प्रलाप की तरह बात तुम्हारी हंसी से शुरू करता हुआ मनुष्य की धूर्तताओं पर आ खड़ा होता हूँ।

अंजलि, हो सकता है भविष्य में हम तुम्हें और ग्लैमरस रोल में देखें मगर फिलहाल तुम्हारी कुछ छोटी-छोटी भूमिकाओं ने बतौर मनुष्य मेरी भूमिका में जरूर इजाफा किया है अब मैं अपने देह पर रेंगती चींटी के प्रति कृतज्ञता का कौशल सीख गया हूँ इसलिए इस बात के लिए मैं तुम्हें थैंक यू जरूर कहूँगा।
खूब आगे बढ़ो और अपनी सहजता से यूं ही हमे यह अहसास कराती रहो कि ये अभिनेत्री कोई करिश्माई किरदार नही है ये हमारे बीच की एक लड़की है जो हमें हमसे बेहतर जानती है।

तुम्हारा एक नूतन दर्शक
जो न्यूटन बिल्कुल नही
डॉ. अजित

Friday, August 4, 2017

जब हैरी मेट सेजल

जब हैरी मेट सेजल
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‘ जिस मुलाकत में कोई किसी से नही मिलता’

इम्तियाज़ अली मेरे प्रिय निर्देशकों में से एक है अभी तक उनकी फिल्मों ने निराश नही किया था, मगर जब हैरी मेट सजल को देखकर मुझे थोड़ी निराशा हुई है. थोड़ी इसलिए कह रहा हूँ कि इम्तियाज़ की पुरानी फ़िल्में मुझे अधिक निर्मम होने की छूट नही दे रही है. इसे एक दर्शक और बढिया निर्देशक का रिश्ता समझा जा सकता है. आज यह फिल्म  देखने के लिए  दो सौ बीस रुपए का टिकिट लिया मगर पूरी फिल्म के दौरान मुझे ऐसा लगता रहा कि यह फिल्म क्यों देख रहा हूँ मैं.
जिंदगी में इमोशंस बहुत आम से चीज़ है मगर  इमोशंस का सिनेमेटिक प्रजेंटेशन बेहद मुश्किल काम है इस फिल्म में यह तय करना मुश्किल है कि कौन किस चीज़ से भाग रहा है.  हैरी और सजल की मुलाक़ात और गहरी और मीठी हो सकती थी उनका सफर और रोमाचंक हो सकता था मगर दोनों की मुलाक़ात बतौर दर्शक मेरे मन में कोई कौतूहल नही जगा पायी.
शाहरुख को अब यह मान लेना चाहिए कि उनकी उम्र हैरी बनने की नही है वो लाख फिट दिखतें हो मगर उनके चेहरे से उम्र के अपने तकाजे नज़र आने लगे है. मैं उन्हें अब डियर जिंदगी के साइकोथेरेपिस्ट जैसे रोल में देखना चाहता हूँ. इस फिल्म में अनुष्का उन पर थोड़ी भारी पडी है मगर अनुष्का के लिए भी बहुत ज्यादा काम फिल्म में बचा नही था.
फिल्म में बढ़िया लोकेशंस है यूरोप का नक्शा है और वहां की गलियां है मगर उस नक़्शे के सहारे उन गलियों में घुमते हुए हैरी और सजल मुझे बेमेल नजर आए. शाहरुख  पंजाबी एक्सेंट में कभी कभी कुछ  डायलोग बोलते है मगर उसके लिए एक्सेंट रियल करने की उनकी वोकल मेहनत कुछ ऐसी साउंड निकालती है कि हमें समझ ही नही आता है कि वो क्या कह रहें है.
दिल और वजूद की जद्दोजहद में अक्सर आदमी दिल की ही सुनता है और ताउम्र खुद से भागता रहता है इसी भागदौड़ में उसकी मुलाक़ात कुछ ऐसे लोगो से होती है  जिनके साथ अपने लम्हें शेयर करने का अफ़सोस नही  होता है बल्कि खुशी मिलती है ये लम्हें हमारी पकड से छूटे हुए कुछ पवित्र किस्म के अहसास होते है जिसको जीने के लिए आदमी खुद को दांव पर लगाने से भी नही चूकता है. प्यार इसी दांव की छाँव में पलता है . यह फिल्म हमें एक अनजानी मुलाकात के सुखद अहसास दिखाने के लिए बुनी गयी थी मगर इस बुनावट में कसावट की अच्छी खासी कमी है इसलिए जब आप इस मुलाक़ात के सहारे अपने अतीत या भविष्य में झूलना चाहते है तो आपको लगता है ये झूला तो एक कमजोर शाख पर डाला गया है चूंकि मुझे इम्तियाज़ से मुहब्बत थी इसलिए मैं इस झूले को अकेले ही खींच कर झूलने के लिए छोड़ आया इसके बदलें मुझे कुछ अच्छी लोकेशन के हवा और एकाध गाने नसीब हुए जिन्हें मैं गुनगुना तो नही सकता मगर तब मैं उनको सुनते हुए थियेटर में अपने व्हाट्स एप्प के मैसेज जरुर चेक कर सकता था.
 जब हैरी मेट सेजल  में  शाहरुख की फाइटिंग और वोकल होने के कुछ सीन अवांछित है इसके अलावा पुर्तगाल के एक सीन में मुझे वो गाना गाता हुआ भी अजीब लगा. अनुष्का इस फिल्म में एक गुजराती लड़की बनी है गुजराती एक्सेंट में उसको सुनना एक अच्छा अनुभव हुआ और फिल्म देखकर मुझे लगा गुजराती लडकियां शायद ज्यादा खुले दिमाग की होती है हालाँकि फिल्म से राय क्या बनानी.
जब हैरी मेट सेजल में सजल की एक अंगूठी खो गयी है उसको तलाशने में फिल्म अपनी यात्रा पूरी करती है मगर मूलत: फिल्म अपने अन्दर की सच्ची खोज और उससे मिलने ख़ुशी से हमें मिलवाना चाहती है हम खुद से भागते हुए खुद की असली चाहत हो भूल जाते है और जिस दिन हमारी चाहत हमारे सामने होती है हम यह तय नही कर पातें कि उसे किस तरह से सहज सकें. जब हैरी मेट सेजल  देखतें हुए यह बात आपको खुद सीखनी पड़ती है क्योंकि फिल्म खुद ही खुद के अन्दर उलझ कर रह गई है.
और अंत में, मुझे फिल्म का एक सीन और डायलोग जरुर पसंद आया जब सेजल हैरी से कहती है कि क्या तुम कल के टिकिट बुक कर सकते हो इस पर हैरी जवाब देता है यस मैंम !
सामान्य  सा डायलोग है मगर मुझे क्यों पसंद आया इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी. इम्तियाज़ की इतनी बढ़िया फिल्में हमने देखी है उसी उधार के बदले उनकी यह एक औसत फिल्म भी देखा जा सकती है.

© डॉ. अजित 

Thursday, July 27, 2017

डियर शैफाली

डियर शैफाली,
उम्मीदन तुम अच्छी ही होंगी इसलिए कुशल क्षेम की औपचारिकता में नही पड़ना चाहता हूँ. जमाने भर मे मैं फिलहाल थोड़ा चिट्ठीबाज़ के तौर पर बदनाम हो चुका हूँ. आज जब जमाने में हर कोई गति से प्यार कर रहा है मैं आज भी उस दौर में अटका हुआ हूँ जब ख़त, रोशनाई और इंतज़ार में एक गहरी दोस्ती हुआ करती थी. मैं पीछे देखता हूँ और मुस्कुराता हूँ. मेरे पास लिखावट की शक्ल में कुछ अच्छी यादें है. दिन ब दिन जटिल होती जिंदगी में मेरे पास ख़त और किताबों की एक छोटी सी दुनिया है इसी दुनिया के भरोसे मैं जीवन के बेहतर होने की उम्मीद को जिंदा रख पाता हूँ.
बहुत दिनों से मेरे ख्यालों में यह खत दस्तक दे रहा था मगर मेरे पास आपका कोई मुक्कमल पता नही था और ख्याल भी बेहद उलझे हुए थे इसलिए मैंने  कुछ दिन आपका पता और कुछ दिन ख्यालों के बाल संवारने में लगा दिए. आज सुबह वो ख्याल मुझे स्कूल जाती किसी लड़की के दो चोटियों जैसे मासूम खड़े मिले मैं उन्हें देख मुस्कुराया और फिर खुद को समेटकर यह खत लिखने बैठ गया.
मेरी  अब तक की बातों से यह साफ़ अनुमान लगाया जा सकता है कि मैं एक आत्ममुग्ध शख्स हूँ क्योंकि आपको चिट्ठी लिखते वक्त भी मैंने भूमिका के केंद्र में खुद को रखा है मगर यह मेरे वजूद का आधा सच है और जो बचा हुआ सच है उसमें कुछ किरदार मेरे इर्द-गिर्द जमा है जिनसे मेरे लगभग रोज़ ही बतकही हो जाती है यह किस स्वप्न में बडबडाने जैसा समझा जा सकता है.
जिन किरदारों के तसव्वुर के जले मेरे दिल ओ’ दिमाग में लगे है उनमें से एक मौजूं किरदार आप भी है. मैंने आपकी ज्यादा फ़िल्में नही देखी है मगर बड़ी या छोटी स्क्रीन पर जब भी आपको देखा है तो आपके वजूद में एक खास किस्म का सम्मोहक ऑरा मैंने महसूस किया है. यह एक बड़ा विस्मय से भरा सम्मोहन रहा है मेरे लिए  आपको देखते हुए हर बार ऐसा लगा कि जैसे कुछ सवाल जवाब की शक्ल में मेरे सामने खड़े है.
आपको आँखों में जज्बाती सरहदों में कुछ मसलें दफ्न है जिन्हें देख ऐसा लगता है कि जैसे खुद खुदा ने अपने चूल्हे से बुझी लकड़ी निकाल कर आपकी आँखों पर काज़ल की गिरहबंदी कर दी है ताकि कुछ दिन मनुष्य अपनी अपनी कामनाओं को प्रार्थना की शक्ल में रूपांतरित करने का हुनर सीख सकें. आपकी पलकों के झपकने का अंतराल मैं अपने मन के दस्तावेजों में कुछ इस तरह दर्ज करता हूँ जैसे कोई जलकर्मी नदी के बढ़ते हुए जलस्तर को घंटो के हिसाब से दर्ज करता है और फिर प्रमाणिकता से नदी के खतरे के निशान से ऊपर बहने की चेतावनी जारी करता है. मैं  आपकी आँखों को समंदर नही कहूंगा क्योंकि समंदर अथाह होता है और यह अंतिम प्राश्रय देता है. मेरे पास इतना प्रतिक्षा के धैर्य का अभाव है इसलिए मैं आपकी आँखों में देखता हूँ और अपने सफर के जरूरी सामानों की एक लिस्ट बनाने लग जाता हूँ इस तरह है मैं इन आँखों में देखते हुए अपने सफ़र की जरूरी तैयारी करता हूँ. मुझे उम्मीद है इनमें जो उदासीनता की चमक है उसके भरोसे मैं अँधेरे में अपनी गति से सुनसान जंगल पूरे उत्साह से गाना गुनाते हुए पार कर सकता हूँ.
यह बात मुझे ठीक से पता है कि अभिनय की दुनिया अपने आप में एक बड़ी आभासी दुनिया है मगर मुझे मुद्दत से आभास को यथार्थ और यथार्थ मान कर जीने की एक खराब आदत हो गई है. जिन्दगी मगर हमेशा अच्छी आदतों के भरोसे कहां जी जाती है इसलिए इस खराब आदत के सहारे मैं आजकल अपने सपनों पर इस्त्री करके उनकी तह लगाकर उन्हें एक अज्ञात बक्शे में जमा कर रहा हूँ. आपको देखने के बाद मैं जीवन का यह सच जान गया हूँ कि जो सपने हम नींद में देखते है वो दरअसल केवल हमारी अतृप्त कामनाओं की छाया होती है.चूंकि आपसे मेरी किसी किस्म की कोई कामना नही जुडी है इसलिए आपसे कभी सपने में मुलाक़ात नही हुई है. मैं इसी कारण आपकी आभासी उपस्थति को वर्तमान का एक सच मानता हूँ.
आपके पास एक विस्मय से भरी दृष्टि है जिससे खुद को बचा पाना लगभग नामुकिन है यह नज़र ठीक वैसी है जैसे किसी पहाड़ी बागान में चाय की पत्तियां चुनती महिलाओं की होती है जो अपनी चाय की पत्तियाँ चुनती है और फिर विस्मय से उनके भार का अनुमान लगाती है. आपको देखकर खुद के अनुमान कौशल को आजमाने का दिल करता है मगर फिर मैं इसलिए ठहर जाता हूँ  शायद हमेशा खुद को सिद्ध करने वाले पुरुष आपको बेहद निर्धन लगतें होंगे. आप मनुष्य को उसके नैसर्गिक रूप में देखना पसंद करती हैं इसलिए मैंने खुद को संभावनाओं और विकल्पों से मुक्त रखने का अभ्यास विकसित किया है यद्यपि मैं इसमें पूर्णत: सफल नही हूँ मगर फिर भी मुझे लगता है जिनके पास कोई योजना न हो ऐसे लोगो को आप हिकारत की नजर से नही देखती होंगी.
पिछले दिनों मैं सौन्दर्य की टीकाओं पर किसी से बात कर रहा था उनका मत था कि सौन्दर्य स्वत: प्रकट नही होता है उसे प्रकाशित करना पड़ता है मैं उन सज्जन से सहमत होना चाहता था मगर तभी मेरे ध्यान में आप आ गई आपको देखकर साफ़ तौर पर सौन्दर्यशास्त्र के इस सिद्धांत की मैं साधिकार अवहेलना कर सकता हूँ कि सौन्दर्य स्वत: प्रकट नही होता है. अलबत्ता तो सौन्दर्य का  विश्लेषण करना खुद में सौन्दर्य का एक अपमान है मगर आपको देखकर मुझे हमेशा से ऐसा लगता है कि आपके पास ऐसा सौन्दर्य है जिसे हम शास्त्रीय मान अप्राप्य नही समझ सकते है जो बुनावट में इतना महीन है मगर वो हमारे आसपास के चेहरों से इतना मिलता जुलता है कि आपको देखकर कभी ऐसा नही लगता है कि आप ऐसी स्टार है जो हमसे इतनी दूर है कि जिस पर बात करते हुए भौतिक दूरी और सामाजिक स्थिति से हमें हीनता का बोध घेरता हो. इसलिए मैं आपको लौकिक तौर बेहद खूबसूरत घोषित करता हूँ क्योंकि मुझे यह बात साफ़ तौर पर पता है कि अलौकिक सुन्दरता का वर्णन करने वाले लोग खुद से झूठ बोलते है और अपरिमेय,अप्राप्य वस्तुओं के दूर होने पर खुद को एक बुद्धिवादी सांत्वना देते है.  
अंत में आपकी हंसी पर एक बात कहना चाहूंगा आपकी हंसी कुछ कुछ वैसी है जैसे कोई मल्लाह सुबह अकेला नाव लेकर समंदर में चला गया हो और जाल को सुलझाने के चक्कर में बिना जाल फेंके फिर से किनारे लौट आया हो. आपकी हंसी मुझे  थोड़ी कुलीनताबोध से भरी मगर थोड़ी जजमेंटल किस्म की लगती थी मगर बाद में मैंने अपने इस निष्कर्ष को अपने मन का एक पूर्वाग्रह पाया दरअसल आपकी हंसी में कोई एन्द्रिक अधीरता नही है यह किसी इंतज़ार के चरम को महसूस करके सीधे हृदय से प्रस्फुटित होती है इसलिए आपकी हंसी को देखते हुए मनुष्य कम से कम अपने दुखों की भावुक प्रस्तुति भूल जाता है. इसलिए भी दुःख आपको नापसंद करते है.
आदतन चिट्ठी लम्बी हो गई है दरअसल मैं जब कुछ कहना चाहता हूँ तो फिर मैं एक नदी की तरह बहना चाहता हूँ हो सकता है मेरे किनारे मेरी बात ध्यान न सुनतें हो मगर मुझे भरोसा है  मेरी गति और यात्रा एकदिन मेरी तमाम बातें ठीक ढंग से संप्रेषित करने में सफल सिद्ध होगी. ये खत भी उसी यात्रा का एक हिस्सा भर है मुझे उम्मीद है देर सबेर यह आपके सही पते तक जरुर तामील होगा.
फिलहाल के लिए इतना ही...शेष फिर !
आपका एक दर्शक

डॉ.अजित  

Tuesday, July 25, 2017

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का
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हिज़ाब में रोज़ी के महकतें सपनों की दास्तान
कामनाओं का अपना एक तिलिस्मी संसार होता है. आदमीयत की अंदरुनी दुनिया अमूर्तन के सहारे बड़ा विचित्र सा संसार बुनती है और जब हम एक औरत की अंदरुनी दुनिया देखने की कोशिश करतें है तो उसकी पेचीदगियां हमें विस्मय से भरती है. मगर ये विस्मय विशुद्ध रूप से एक पुरुष का विस्मय हो ऐसा भी नही है. जब एक स्त्री खुद से गहरी मुलाक़ात करने अपने मन के तहखाने में उतरती है फिर वहां मन और देह कुछ समय अक्लांत हो जीना चाहते हैं. वो हर किस्म की कन्डीशनिंग से मुक्ति चाहते है. ये चाहतें जब बाहरी दुनिया में आकार लेती है तो हम इन्हें तथाकथित वर्जनाओं से अतिक्रमण के रूप में देखतें है. ऐसा देखने का हमारा एक तयशुदा सामाजिक प्रशिक्षण है.
यह फिल्म स्त्री मुक्ति का कोई वोकल नारा नही देती है और ना ही इस फिल्म के जरिए समाधान की शक्ल में कोई निष्कर्ष तय कर सकतें है मगर यह फिल्म चार महिला किरदारों में माध्यम से उनके जीवन में बसे आंतरिक आकर्षणों और उसको पाने के लिए की गई जद्दोजहद का एक बढ़िया रूपक प्रस्तुत करती है.
जेंडर के संदर्भ में समाज का एक अपना ज्ञात सच है और इसी ज्ञात सच को हमें अंतिम रूप से मानने के लिए समाज तैयार करता है इसमें कोई दो राय नही कि लैंगिक पूर्वाग्रह और भेदभाव के चलते पुरुष ने खुद को एक सत्ता के रूप में स्थापित किया है समाज की अंदरूनी लोकतंत्र बेहद कमजोर और डरा हुआ है इसलिए सवाल करती हर स्त्री को वो एक सांस्कृतिक खतरे के तौर पर प्रोजेक्ट करता है.
रोज़ी एक औपन्यासिक नाम है जो फिल्म की सूत्रधार है प्रतीकात्मक रूप से देखा जाए तो यह मन के बीहड़ में उगा कामनाओं का गुलाब है जो मुरझाना नही चाहता है और अपने लिए हवा खाद पानी का प्रबंध करने के लिए हर स्त्री को अपने अपने ढंग से उकसाता है उसे सपने देखने की हिम्मत देता है.
लिपस्टिक अंडर माय बुर्का फिल्म में कायदे में हमें केवल एक लड़की और एक महिला बुर्के में नजर आती है मगर ये बुर्का स्त्री के अस्तित्व पर पड़ा वर्जनाओं और रूढ़ियो का सदियों पुराना पर्दा है जिसके अन्दर का अन्धेरा देखने की कभी कोई कोशिश नही होती है. यह फिल्म व्यक्तिवादी चेतना के जरिए स्त्री के आंतरिक संघर्षों को सेक्सुअलिटी के संदर्भ में रेखांकित करने की एक अच्छी कोशिश है.
यदि हमें इसे एक सामाजिक यथार्थ के रूप में देखें तो यह आधी आबादी का एक संगठित सच है मगर चूंकि फिल्म कोई आन्दोलन या नारा नही है इसलिए फिल्म का नेरेशन इस द्वंद से लडती स्त्री को कोई रास्ता नही दिखाती है. यह फिल्म मध्यमवर्गीय स्त्री की मन और देह के स्तर पर एक शुष्क मनोवैज्ञानिक रिपोर्टिंग करती है सिनेमा यदि दिशा का बोध कराए तो उसका कोलाज़ बड़ा हो जाता है. यहाँ फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ गई है.
एक अधेड़ स्त्री जो जंत्री में रखकर कामुक साहित्य पढ़ती है, एक ब्यूटी पार्लर चलाने वाले लड़की जो सेक्स को ही प्रेम और आजादी का प्रतीक मानती है जबकि उसकी खुद की मां न्यूड पेंटिंग्स के लिए मजबूरीवश मॉडलिंग का काम करती है, एक लड़की जो कालेज गोइंग है मगर बुर्का और परवरिश के धार्मिक संस्कारों के बोझ के तले दबी है वो खुल कर जीना चाहती है. जींस,शराब,सिगरेट, बूट, परफ्यूम, नेलपेंट उसके आयुजन्य और परिवेशजन्य आकर्षण है जिसके लिए शोपिंग माल में चोरी तक करती है,एक मुस्लिम महिला जिसका पति प्यार और सेक्स में भेद नही जानता है जो मेल ईगो से भरा हुआ है और जिसे औरत का काम करना खुद के वजूद की तौहीन लगता है जो संसर्ग के नाम पर हमेशा बलात्कार करता है.
ये चार महिलाओं का किरदार इस फिल्म में स्त्री समाज का वर्ग प्रतिनिधित्व करने के लिए गढ़े गये है निसंदेह चारों ही समाज का अपने-अपने किस्म का सच भी है . इन चारों स्त्रियों के पास एक अपरिभाषित किस्म का सपना है और रोज़ उसके पीछे भागने की एक जुगत भी है मगर कामनाओं के दिशाहीन संसार में जब आप अकेले दौड़तें है तो एक दिन थककर बैठना आपका निजी सच बन जाता है. यही सच स्त्री के आंतरिक एकांत का भी सच फिल्म के जरिए हमें देखने को मिलता है.
आजादी और बराबरी के डिस्कोर्स में फिल्म देह की तरफ झुकती है तो कभी कभी उत्तर आधुनिकता यथा सेक्स, शराब,सिगरेट के जारी प्रतीकात्मक रूप बराबरी के मनोवैज्ञानिक दावें को भी प्रस्तुत करती है मगर फिल्म का अंत कोई एक स्टेटमेंट नही बन पाता है. सपने देखना जरूरी है और अपनी खुशी की चाबी खुद के अंदर होती है मौटे तौर पर फिल्म यह उद्घोषणा करके खत्म हो जाती है.
लिपस्टिक अंडर माय बुर्का के जरिए हम आधी दुनिया का आधा सच जान पाते है और यदि फिल्म देखकर हम मात्र यह धारणा बना लें कि स्त्री मुक्ति का रास्ता देह की आजदी से जाता है तो यह भी एक किस्म की जल्दबाजी होगी दरअसल आजादी और बराबरी को एक फिनोमिना के स्तर पर समझाना इतना आसान काम भी नही है यह फिल्म जीवन के उस पक्ष पर एक सार्थक बातचीत करती है हम जिसका शोर रोज़ सुनते है मगर सुनकर भी जिसे हम अनसुना कर देते है मेरे ख्याल से फिल्म की यही सबसे बड़ी सफलता है.
लिपस्टिक अंडर माय बुर्का के जरिए हम मध्यमवर्गीय चेतना के नैतिकता और यौनिकता से जुड़े ओढ़े हुए समाज के पाखंड को देख सकते हैं यह फिल्म हमें उस दुनिया में ले जाती है जहां एक स्त्री अपने एकांत से भागकर अपनी कामनाओं का पीछा कर रही है उसे थकता हुआ देखकर पुरुषवादी मन को संतोष मिलता है और फिल्म इस लिहाज़ से अपना काम बेहतरी से कर गयी है क्योंकि इस फिल्म में कोई कोलाहल नही है मगर फिर भी द्वंदों की एक मधुमक्खी वाली सतत भिनभिनाहट जरुर है जिसे छूने पर डंक का खतरा महसूस होता है मगर स्त्री उसे छूती है और अंत में अपने दर्द पर उत्सव की शक्ल में रोते-रोते हंसने लगती है.
© डॉ. अजित

Sunday, May 21, 2017

हिंदी मीडियम

हिंदी मीडियम: मेरा पाठ  
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मेरा जैसा देहात से निकला दर्शक ऐसी फिल्मों को दिल से लगा लेता है. भले ही कामकाजी चक्करों में वो शहर का बाशिंदा बन गया है मगर असल में उसका दिल श्याम प्रकाश ( दीपक डोब्रीयाल) के जैसा ही है वो किसी का हक चाहकर भी नही मार सकता है.
हिंदी बनाम अंग्रेजी की बहस दरअसल दो भाषाओं के औचित्य की बहस नही है यह बहस है कुलीनता बनाम निम्नमध्यम वर्ग की. यह बहस है इंडिया बनाम भारत की. अंग्रेजी भाषा जब एक सम्प्रेष्ण के टूल से बढ़कर हमारे लिए गर्व का विषय बन समाज का हिस्सा बनती है तब यह सीधे-सीधे देश के अन्दर एक बड़ी लकीर खींच देती है.
‘हिंदी मीडियम’ जैसी फ़िल्में दरअसल कोई समाधान भले ही प्रस्तुत न करती हो मगर ये एक बड़े वर्ग के द्वंद को बहुत अच्छे से चित्रित जरुर करती है. फिल्म का मूल विषय बड़े और महंगे स्कूल में एडमिशन को लेकर मरते महानगरीय पेरेंट्स है वो किस किस्म के दबाव से गुजरते है वह देखने लायक चीज़ है, मगर ये दबाव उन्होंने परिवेश से अर्जित किया है इसके लिए उनका स्वयं का दोष भी कम नही है. एक तरफ देश के अन्दर सांस लेता एक दूसरा देश है जो उम्मीद की रोटी रोज खाता है मगर फिर भी खाली पेट सोता है. आरटीई जैसा क़ानून गरीबों के बच्चों को बड़े स्कूलों के क्लासरूम ले जाना चाहता है मगर शिक्षा को व्यवसाय मानकर करने वाले बड़े स्कूलों के अपनी एक अलग किस्म अभेद्य दुनिया है.
कई दिन से मेरे जेहन में एक बात घूम रही थी आज यह फिल्म देख कर कहने का मौक़ा मिला है तो जरुर कहूंगा आप मेरी और अपनी पीढ़ी के लोगो को गौर से देखिए हम लोग यहाँ तक बिना किसी पेरेंटल गाइडेंस के  पहुंचे है. जो लोग गाँव देहात से निकले है उनके माँ-बाप कई बार साक्षर भी नही होते थे या फिर उनकी साक्षरता अक्षरज्ञान भर जैसी होती है. मेरे खुद के पिता को ये नही पता था कि मैंने 12 तक कौन से विषय पढ़ें है मगर फिर भी हम उच्च शिक्षित हुए और दुनिया की आँख में आँख मिलाकर बात करने की योग्यता अर्जित की है अब जो नई शिक्षानीति देश में लागू हुई है उसमें जिनके माँ-बाप गरीब और अनपढ़ है वो इस एजुकेशन सिस्टम में सरवाईव नही कर सकते है. ये देश के लिए एक बेहद खतरनाक संकेत है. हिंदी मीडियम देखकर आप मेरी इस चिंता को ठीक से समझ पाएंगे.
फिल्म में एडमिशन की मारा-मारी में फंसा एक बिजनेसमेन(इरफ़ान खान) की कहानी है जिसके पास पैसा जरुर है मगर अंग्रेजी में कमजोर है इसलिए महंगे और बड़े स्कूल में बेटी का एडमिशन नही हो पा रहा है. इरफ़ान खान की पत्नी ( सबा कमर  ) अपनी बेटी के एजुकेशन को बढ़िया स्कूल में एडमिशन कराने को लेकर ओवरकांशियस है. दरअसल ये केवल बेटी के एडमिशन का मसला नही है ये एक क्लास शिफ्ट की जद्दोजहद से गुजरते परिवार की कहानी है जो अपनी दुनिया में बहुत खुश था मगर एक एडमिशन की घटना उनकी दुनिया बदल देती है.
हिंदी मीडियम में गरीबी का गरिमापूर्ण फिल्मांकन मन को द्रवित कर देता है.फिल्म गरीबी को परिभाषित जरुर करती है शिक्षा को लेकर उनके बुनियादी हक़ को छीनने वाली ताकतों को खुलकर एक्सपोज़ नही करती है, हालांकि फिल्म कोई नारा नही होती है इसलिए मुझे क्रान्ति से अधिक एक सामाजिक सन्देश की दरकार फिल्म से रहती है. गरीबों का हक मारकर आरटीई जैसे कानून का मजाक कैसे बनाया जाता है यह फिल्म देखकर पता चलता है मगर आप इस अपराध को अभिभावकीय जद्दोजहद समझ माफ़ करते चलते है इससे पता चलता है कि हम कहीं न कही अवचेतन के स्तर पर इस फर्जीवाड़े को लेकर कन्वीन्स भी है.
श्याम प्रकाश ( दीपक डोबरियाल) फिल्म में रुलाने के लिए ही है वो कमाल के अभिनेता है और इस फिल्म में उनका रोल छोटा जरुर है मगर उनका किरदार सिद्धांतो की ऊंचाई के मामलें में इरफ़ान कहां से की गुना बड़ा है. उनका एक डायलोग ‘गरीबी की आदत धीरे-धीरे लगती है’ अपने आप में एक कम्प्लीट स्टेटमेंट है. दीपक के आने के बाद फिल्म का कैनवास निसंदेह कई गुना बढ़ जाता है.
हिंदी मीडियम अपने बच्चों के साथ देखे जानी वाली फिल्म है क्योंकि अंग्रेजी का भूत अब हमारे कंधो से उतर कर उन्ही की सवारी कर रहा है. देश के एजुकेशन सिस्टम में भाषाई पूर्वाग्रह और गरीबी की समस्य के बीच उनके बुनियादी हक की लड़ाई के नितांत की अकेले होने की कहानी को हिंदी मीडियम के माध्यम से कहने की एक ईमानदार कोशिश की गई है.
फिल्म देखकर आप यह भी जान पाएंगे कि जब गरीब अपनी क्लास शिफ्ट करता है तब वह सबसे पहले गरीब और गरीबीयत से मुंह मोड़ता है. कड़वा अतीत भूलकर हर कोई इंडिया में रहना चाहता हैं क्योंकि भारत के साथ उनकी कड़वी स्मृतियाँ जो जुड़ी है.
पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर  अच्छी लगी है उनका अभिनय भी अच्छा है मगर उनकी लम्बाई इरफ़ान पर थोड़ी भारी पड़ी है मुझे गरीबी वाले रोल में अधिक खूबसूरत लगी इसकी शायद एक निजी वजह यह भी हो सकती है कि गरीबी और मामूलीपन मेरे परिवेश का हिस्सा रहा है हालांकि मैं कभी गरीब नही था इसलिए यहाँ इस कथन को गरीब होने का ग्लैमर लूटने वाले समझा सकता है इसलिए बताना जरूरी समझा ताकि मैं किसी के हिस्से का हक ना मार सकूं.
© डॉ. अजित 

Friday, November 25, 2016

डियर ज़िन्दगी

'डियर ज़िन्दगी' अच्छी फिल्म है। देखने लायक। खुद के डरों से मिलवाती अंदरूनी लड़ाईयों का इश्तेहार करती फिल्म है। दरअसल ये फिल्म ज़िन्दगी से दोस्ती करने का नुक्ता बताती है वो अतीत के द्वन्द के वर्तमान पर प्रभाव को रेखांकित करती है। प्यार करने के लिए निर्द्वन्द और बेख़ौफ़ ज़िन्दगी चाहिए और जिंदगी से दोस्ती वही कर सकता है जो अपने डरो को विदा कर सके।
अच्छी बात है  अब भारत में ऐसे साइकोलॉजिकल कल्ट विषयों पर मूवी बनी शुरू हो गई है। पेरेंटिंग के रोल और पर्सनलिटी डायनामिक्स पर एक बढ़िया सिनेमेटिक डायलॉग फिल्म शुरू करती है।
डियर जिंदगी देखने के लिए मैच्योर ऑडियंस होना जरूरी है वरना लोग फिल्म के बीच में बोल बोल कर मजा किरकिरा करने से बाज नही आते शायद छोटे शहरों की ही यह दिक्कत हो।
डियर ज़िन्दगी दरअसल जिंदगी के नाम लिखा एक खत है जिसे आप रोज़ अकेले में पढ़ते है फिल्म को देखते वक्त आपको अपनी लिखावट और धूमिल हुए पते को साफ़ साफ़ देखने का अवसर मिलेगा बीच बीच में जहां जहां आँखे नम होंगी समझ लीजिए वो टिकिट चिपकाने का ग्लो है। उम्मीद यह की जा सकती है फिल्म देखकर आप अपने खत ज़िन्दगी के नाम रवाना कर देंगे और दुआ यह है कि आपका कोई खत बैरंग न लौटे।
आलिया भट्ट का शानदार अभिनय है। शाहरुख खान साइकोलॉजिस्ट की भूमिका में अच्छे लगे है, चूंकि मनोविज्ञान मेरा विषय रहा है इसलिए उनको थेरेपिस्ट के रूप में देखकर मुझे और भी अच्छा लगा। रोशार्क (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) को फिल्म में देखना अच्छा लगा।
ज़िन्दगी का फलक बहुत बड़ा है उससे आँख मिलाकर बात करने का जो हौसला चाहिए वो हम सब के अंदर मौजूद होता है बस उसे पहचानने की जरूरत भर होती है। डियर जिंदगी देख आप खुद से एक ईमानदार बातचीत कर सकते है एक बच्चे के रूप में खोई हुए चीजों को तलाश सकते है और एक पेरेंट के तौर खुद को प्रशिक्षित कर सकतें है।
गुस्सा,प्यार,डर, एकांत,महत्वकांक्षा इन सब जटिल चीजों को समझने के लिए यह एक फिल्म काफी है। सहज रहने के लिए खुद से मुलाक़ात जरूरी होती है डियर जिंदगी उसी मुलाकात का समन है जो हमें फिल्म देखतें देखतें तामील हो जाता है।
फिल्म में गाने के फिलर के तौर में मौजूद है मगर ठीक ठाक है।
कुल मिलाकर एक देखने लायक फिल्म।

Friday, September 23, 2016

पार्च्ड-2

कल पार्च्ड मूवी देखी। फिल्म देखकर फिल्म के सेंट्रल आईडिया पर एक लंबा क्रिएटिव नोट भी लिखा। आज फिल्म की प्रमुख पात्रों पर लिखने की कोशिश कर रहा हूँ इस उम्मीद के साथ कि आपको तस्वीर और साफ़ नज़र आएगी।
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पार्च्ड का कथानक राजस्थान/गुजरात के सीमांत गाँव पर बुना गया है। जहां रेत ही रेत है कच्चे मकान है बबूल के पेड़ है और उन सबके ऊपर पितृ सत्तात्मक समाज का आकाश है। वहां दकियानूसी और रूढ़ियों की कठिन धूप है जिसकी आंच में मनुष्यता जलती है वहां केवल पुरुषों को निर्णय लेने की आजादी है। स्त्री वहां भोग्या है और पुरुषों के लिए एक कार्मिक और दैहिक टूल भी।
गाँव की पंचायत में भले ही बूढ़े बुजुर्ग गाँव की समस्या सुनने के लिए बैठते है मगर उनके कान महिलाओं की समस्याओं के मामलें में बहरे है उनकी बोली भले ही राजस्थानी/गुजराती है मगर उसमें शोर कमोबेश खाप पंचायत जैसे तुगलकी फैसलों का ही है। उनके हिसाब से कुल और गांव की इज्जत बचाने की सारी जिम्मेदारी स्त्री की है पुरुष का काम केवल छद्म नैतिकता का डंडा चलाने के है और बड़ी चालाकी से गाँव का ये सिस्टम पुरुषों की सारी लम्पटई को सामाजिक स्वीकृति भी देता है। ये सिस्टम नियोजित ढंग से एक निःसहायता का बोध स्त्री के मन में भरता है जो खुद अपने वर्ग की मदद नही कर सकती है मानो मजबूरी उसकी नियति बना दी गई है। फिल्म के एक सीन एक माँ की मजबूर आँखें दिखती है जो जानती है उसकी बेटी के साथ ससुराल में देवर और ससुर द्वारा दैहिक शोषण होता मगर फिर भी वो मजबूर है और बलात उसे ससुराल भेजना चाहती है।
गाँव के अंदर का ये सिस्टम महज राजस्थान के अति पिछड़े गांव की कहानी नही बल्कि ये कमोबेश देश के हर गांव का स्याह सच है।
अब बात फिल्म के किरदारों की करता हूँ।
रानी:
रानी की शादी कम उम्र में हो जाती है। राजस्थान में बाल विवाह एक बड़ी सामाजिक समस्या आज भी है। फिर पति की उपेक्षा को झेलती है क्योंकि पति ने बाहर एक दूसरी महिला से रिश्तें रखे हुए है। सास कहती है एकदिन सब ठीक हो जाएगा मगर रानी की।ज़िंदगी रानी जैसी बल्कि गुलामों जैसी रही और ये सब ठीक होना कभी ठीक नही हुआ। पति एक दुर्घटना में मर जाता है फिर रानी काले बाने में विधवा का जीवन जीने की अभ्यस्त हो जाती है। उसका एक नालायक बेटा है गुलाब है बिन बाप की परवरिश और दोस्तों के कुसंग ने उसको बिगाड़ दिया है उम्र कम है मगर वो मर्द होने के अभिमान से ग्रसित है। रानी को लगता है उसका ब्याह करके वो चैन से सो सकेगी मगर ये चैन उसे आखिर तक नसीब नही होता है।
उसकी अपनी कामनाएं उसने हमेशा के लिए नेपथ्य में भेज दी है वो मेहनतकश है और थोड़ी बहुत हंसोड़ भी। गुलाब उसके जीवन का दूसरा स्थाई दुःख है जो पूरी फिल्म में उस पर तारी रहता है।
लज्जो:
रानी की दोस्त है। पति शराबी है और मारपीट करता है।लज्जो को बाँझ घोषित किया हुआ है। इसी कारण पति का शोषण चरम पर है। लज्जो के अंदर एक बाल सुलभ खिलंदड़पना भी है वो अपने सारे दुःखों को भूलकर रानी के साथ हंसती गाती है।उसकी देह पर चोट के निशान जरूर है मगर असल में उसका स्त्रीत्व जख्मी है वो आत्म सम्मान से जीना चाहती है। उसके वही छोटे छोटे सपनें है मगर पति के शोषण के समक्ष वो बंधुआ है। वो एक सवाल का केंद्र बनती है कि क्या पुरुष बाँझ नही हो सकता है? और जब उसका जवाब उसे मिलता है तो उसकी दुनिया बदल जाती है फिल्म के अंत में उसे शोषण से स्थाई मुक्ति मिलती है।
बिजली:
बिजली रानी की दोस्त है वो नाचने गाने वाली वेैश्या है। रानी की पति शंकर कभी उसका ग्राहक हुआ करता था। एकदिन वो शंकर को उसके घर छोड़ने आई तो रानी ने उसको धन्यवाद कहा और खाना खिलाया। बिजली इस आत्मीयता की कायल होकर रानी की दोस्त बन जाती है। रानी,लज्जो और बिजली तीनों पक्की दोस्त है। बिजली पेशे से जरूर वेश्या है मगर उसकी चेतना रानी और लज्जो की अपेक्षा अधिक मुखर है। वो कड़वे सच को पूरी ईमानदारी से कहने की हिम्मत रखती है उसके समाज से दोगलेपन से घिन्न है। फिल्म के एक सीन में सारी गालियों के केंद्र में महिला होने पर बिजली कुछ नई गालियां ईजाद करती है जिसमें पुरुषों को गाली का केंद्र बनाया जाता है ये स्त्री सशक्तिकरण की नही स्त्री के मन में दबे हुए आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट होता है।
बिजली के पास सपनें है फंतासी है और एक सच्चे प्रेमी की कल्पना वो लज्जो और रानी को सपनें देखना सिखाती है उन्हें उनकी अंदरूनी दुनिया से मिलवाती है। वो उन दोनों की सारथी है उन्हें अंत में उनकी खुशियों तक ले जाती है।
जानकी:
गुलाब की पत्नी है जिसका बाल विवाह हुआ है। रानी एक सख्त सास है मगर उसके मन में वात्सल्य भी है। रानी को लगता है कि जानकी उसके बेटे को सुधार देगी (यह देहात की हर माँ की एक बेतुकी उपकल्पना रहती है) मगर बाद में जब गुलाब शराब पीकर उसके साथ मारपीट करता है तब रानी को जानकी में अपना अतीत साफ नजर आने लगता है। रानी अपनी गलती सुधरती है और जानकी के जीवन को एक सही दिशा देती है यहां वो सास से एक क्रांतिकारी माँ की भूमिका में तब्दील होती है।
गुलाब:
रानी का  बिगड़ैल बेटा है अभी किशोर है मगर उसमें पुरुष होने का दम्भ बेहद गहरा है। मोबाईल में अश्लील एमएमएस की क्लिप रखता है आवारा दोस्तों के साथ घूमता है शराब पीता है और पतन की पराकाष्ठा पर जाकर वेश्यावृत्ति भी करता है। इतनी कम उम्र में उसके ये तेवर देखकर दर्शक को पूरी फिल्म में उस पर गुस्सा बना रहता है।गुलाब के पतन का चरम यहां तक है कि वो अपनी माँ की दोस्त बिजली के पास तक पैसे लेकर वेश्यावृत्ति करने चले जाता है जिस पर उसको थप्पड़ पड़ता है। वो क्रूर पुरुष और शोषक की भूमिका में है बेहद दकियानूस है और गाँव में हर किसी नए किस्म के परिवर्तन का विरोधी है वो पढ़ाई लिखाई को गैर जरूरी समझता है। रानी अंत में उसका मोह छोड़कर एक मिसाल पैदा करती है।
किशन:
गाँव का प्रगतिशील युवा है। जिसने नॉर्थ ईस्ट की लड़की से प्रेम विवाह किया है गाँव में हस्त शिल्प का एक प्रोजेक्ट चलाता है। उसके जरिए गाँव की महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही है। वो रूढ़ियों का विरोधी है इसलिए गाँव के पुरुषों की नजरों में खलनायक है। उसकी मदद से महिलाएं गांव में अपने पैसो से टीवी ला पाती है। वो वंचितों का सच्चा मददगार है। रानी की खूब मदद करता है मगर गुलाब उसके लिए जितना बुरा कर सकता है उतना करता है।

फिल्म का मास्टरस्ट्रोक सीन:
फिल्म के एक सीन मेंलज्जो से प्रणय अनुमति लेता एक युवा सन्यासी जब लज्जो के पैर आदर से छूता है तब लज्जो की आँखों से आंसू इस तरह बहते है मानों अंदर बरसों से जमा दर्द का ग्लेशियर फूट पड़ा हो वो अपने जीवन में पहली बार एक पुरुष का यह रूप देखती है जो उसके स्त्रीत्व इस तरह से आदर देता है।पति की मार पिटाई से त्रस्त लज्जो के लिए यह अनुभव दिव्यतम श्रेणी का था। वहां अनुमति लेने की चाह संसर्ग को वासना से इतर एक कलात्मक और चैतन्य अनुभूति में बदल देती है। स्त्री पुरुष सम्बन्ध की पवित्रता और चैतन्यता की वो अद्भुत प्रस्तुति बन पड़ी है।

© डॉ.अजित


पार्च्ड

रेत शुष्क ही नही दरदरा भी होता है इसलिए चुभता भी है,उसे हवा उड़ाती है मगर वो एक जगह न ठहरने के लिए शापित भी होता है। देह और मन दो ध्रुव है जिस पर झूला डाल भरी दोपहरी की लू मे झूलने की कोशिश की जा सकती है भले इसमें देह का ताप बढ़ जाए।
समाज समूह से बनता है मगर समूह के भीतर एक वैयक्तिक नितांत हमेशा बचता चला आता है।जिस पर कभी रूढ़ियों की बेल चढ़ी होती है जो अपनी हरियाली में भी चुभने के स्तर तक जालिम होती है  तो कभी हम  लैंगिक भिन्नता की ओट लेकर खुद एक क्रूर रिवाजों की तिरपाल तान देते है जिसके अंदर वही दिखता है जो हम देखना चाहतें है।
पार्च्ड तीन महिलाओं की आंतरिक दासता की नही बल्कि देशकाल समाज की एक तरफा दुनिया की उपेक्षा से सूखी तीन नदियों की कहानी है। जिसके रेत में ठंडक नही है बल्कि एक किस्म की जलन है जिस पर नँगे पांव चलते हुए दिल और दिमाग दोनों एक साथ जलते महसूस होते है। जिसके किनारे खड़े वृक्ष शीतल छाया नही देते बल्कि बाँझ होकर भी वो हरे भरे दिखने की अति नाटकीयता और छद्म दुनिया का हिस्सा बने होते है।
पार्च्ड सम्भावना की एक यात्रा है जो स्याह सच की रोशनी में सबके हाथ में एक दर्पण थमा जाती है ताकि बंदिशों के कारोबार में हम मनुष्यता की दासता को देखकर अपनी मनोवृत्ति और कुत्सा की उम्र का सही सही अंदाजा लगा सके।
देह का भूगोल मन से जब बैर पाल लेता है तब किस्सों में खुद का वजूद मुखर होकर रूबरू होता है सखा भाव सह अस्तित्व का मूल है इसकी योगमाया स्त्री चेतना की आंतरिक अनुभूतियों के सबसे बड़े केंद्र के रूप में हमेशा सुषुप्त रहती है।
जब खुद से एक गहरी मुलाक़ात होती है तब आंतरिक जड़ता टूटती है और प्रतिशोध पैदा होता है। गाँव देहात की आत्मीयता के जंगल में स्त्री की उम्रकैद का दस्तावेज़ जब अनुवाद के लिए सिनेमेटिक फॉर्म में सामनें आता है तो हम फिल्म देखते हुएअवाक होकर अपने शब्द सामर्थ्य पर खेद प्रकट कर कुछ मोटे मोटे अनुमान विकसित करते पाए जाते है।
बिन बाप का एक बिगड़ैल बच्चा गोखरू की तरह तलवों में चुभता है और ये चुभन दिल ओ दिमाग में फिल्म के अंत तक बनी रहती है। उम्मीद कुछ कुछ हिस्सों में रेत को मिट्टी बनाने की कोशिश करती है ताकि उसके जरिए दासता की लिपि को पोतकर प्यार का नया शब्दकोश रचा जा सकें।
प्रेम,प्रणय और वेदना की युक्तियां जब रेत में सांरगी बजाती है तब आँखों में आंसू होते है और बदन पर अपवंचना के कसे हुए तारों की छायाप्रति। पार्च्ड में उंगलियों पर हल्दी का लेप लगा है जो देह की चीत्कार से बने भित्तिचित्रों को कुरेद कर पहले जख्म की शक्ल देते है फिर उनका उपचार भी आंसूओं से करते है।
वक्त की शह और स्त्री पुरुष सम्बन्धो की आंतरिक जटिलता पर एक गहरा काजल का टीका लगाकर उसको नजर लगाने की कोशिश इस फिल्म की गई है अब तक काले टीके से नजर उतारने की रवायत रही है।यह स्त्री के मनोविज्ञान का आख्यान भर नही है बल्कि उसकी देह के समाजशास्त्र की अटरिया पर सूखतें उसके मन की परतों का महीन लेप बनाती है जो मन के जख्म भरने की दवा भी है और दुआ भी।
फिल्म बहुत कुछ जलाती है और बहुत कुछ अधजला छोड़ जाती है ताकि हम उसे देख ये तय कर सकें कि सभ्यता का विकास असंगतता के साथ क्यों हुआ है और क्यों किसी के हिस्से की खुशी पर किसी और का पहरा है।
अगर पहरे और बंदिशों में खुशियों का एक तरफा कारोबार हमनें समाज की रीत बना दी है तो इसके नफे नुकसान के लिए गर्दन झुका कर अपने उत्पादक तंत्र की पुनर्समीक्षा करनी होगी क्योंकि इस ग्रह के कुछ कुछ हिस्सों में ये निजता और वैयक्तिक संदर्भ की भ्रूण हत्या करके एक ऐसी दुनिया बना रहा है जहां एक आदमी खुश है तो एक आदमी शोषित कम से कम ईश्वर ने मनुष्य को इसलिए नही बनाया था।
पार्च्ड ईश्वर की मनुष्यता से निराशा की दो घण्टे की कहानी है जो अंत में एक चौराहे पर लाकर खड़ा करती है अब ये चुनना हमें खुद होगा कि हम लेफ्ट जाए कि राईट हां ये फिल्म देखकर आप राइट जा सकते है बशर्ते आप दिशाबोध से मुक्त होकर पहले सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत विकसित कर लें,मेरे ख्याल से फिल्म का मकसद भी यही है।

© डॉ.अजित

Friday, September 16, 2016

पिंक

शुजीत सरकार संवेदनशील विषयों पर फिल्म बनाने वाले निर्माता/निर्देशकों में से एक है। 'पिंक' ऐसे ही जॉनर की उनकी फिल्म है। इस फिल्म को निर्देशित किया अनिरुद्ध रॉय ने।
 उदारता,सहिष्णुता और ज्ञान परम्परा में विश्व के गुरु होने का दावा करने वाले भारत देश का समाज यथार्थ में कितने पूर्वाग्रहों और स्टीरियोटाइप्ड सोच के साथ जीता है पिंक यह बताती है।जेंडर सेंसेब्लिटी की ट्रेनिंग हमारी कितनी कमजोर है साथ स्यूडो और बायस्ड एथिक्स और मोराल के साथ हम किस तरह का समाज बना पाए पिंक उसी की तरफ हमारा ध्यान ले जाती है।
पिंक केवल कोई फेमिनिज़्म का नारा नही बनती बल्कि समाज के दोहरे मापदंड और हिप्पोक्रेसी को उजागर करती है।
देश की राजधानी दिल्ली में लड़कियां कितनी सुरक्षित है यह फिल्म का केंद्रीय विषय नही है मगर दिल्ली में वर्किंग और अकेली रहती
लड़कियों को लेकर जो सोशल परसेप्शन है फिल्म उसको जरूर उधेड़ती नजर आती है।
पिंक का मूल दर्शन यह है कि 'नो' (नही) का मतलब नही ही होता है ये एक कम्पलीट लॉजिक है इसे किसी व्याख्या की जरूर नही होती है। यदि किसी महिला ने 'नो' कहा है तो इसे नो ही समझना चाहिए न कि बलात उसके नो को सहमति में बदलने की जुर्रत की जाए चाहे वो गर्ल फ्रेंड हो,सेक्स वर्कर हो या फिर आपकी बीवी ही क्यों न हो।
'पिंक' स्त्री मन की महीन पड़ताल करती है देह को लेकर समाज की दृष्टि और उसकी सहजता को उसकी उपलब्धता मान लेने कि एक स्थापित मनोवृत्ति पर सवाल खड़े करती है। इसके अलावा फिल्म के जरिए देश की राजधानी दिल्ली को एक समाजशास्त्रीय संकट से गुजरते भी देख पातें है और वो समाजशास्त्रीय संकट यह है दिल्ली के आसपास के राज्यों जैसे हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामंती किसान और रियल एस्टेट कारोबारी जब राजनीति में दखल बनाते है और दिल्ली में दबंगई करते है उसके बाद वो एक अलग लकीर दिल्ली के दिल में खींच देते है एक दिल्ली वो है जो महानगर है जिसे कायदे से खुला सुरक्षित और प्रगतिशील होना चाहिए साथ ही वह देश की राजधानी भी है और दुसरे इस प्रोपर्टी कारोबारियों से राजनीतिज्ञ बने लोगो के बिगड़ैल बेटे है जो ठीक से पढ़े लिखे होने के बावजूद भी वही पितृ सत्तात्मक और सामंती सोच के साथ शहर में अपने कद और पद का जमकर दुरूपयोग करते है इनकी जेंडर सेंसेब्लिटी एकदम से जीरो होती है। दिल्ली के अंदर बसता ऐसा देहात नई और ऐसी प्रगतिशील दिल्ली को स्वीकार नही कर पाता है जो ह्यूमन राइट्स और जेंडर सेंसिबल हो यह अंतर्विरोध महिलाओं को लेकर होने वाले अपराधों का एक बड़ा फैक्टर भी है।
फिल्म एक पार्टी नाईट के किस्से पर आधारित है शुरू में स्लो है मगर कोर्ट की कार्यवाही के सीन फिल्म को गति प्रदान करते है।
जब आप मुश्किल वक्त में होते है जब बुद्धिवादी और परिवक्व प्रेमी भी साथ छोड़ देते है उनके लिए इमेज के लिए पलायन अनिवार्य हो जाता है इसलिए उन्हें प्रेमी नही कायर ही कहा जाता है ये फिल्म देखकर पता चलता है।
मीनल अरोड़ा फिल्म की केंद्रीय पात्र है कहानी उन्ही के इर्द गिर्द घूमती है। कहानी आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगी। पिंक लड़कियों के संघर्ष और दोस्ती एक भावुक दस्तावेज़ बन पड़ी है।
अमिताभ बच्चन फिल्म में एक ऐसे वकील की भूमिका में है जो वकालत छोड़ चुका है जिसकी बीमार पत्नी है और जो खुद अस्थमा से लड़ रहा है मगर उसकी चेतना जागती है और वो लिंग भेद और उत्पीड़न के संघर्ष में मीनल का साथ देता है। उनका अभिनय अच्छा है मगर वो तभी अच्छे लगे जब कोर्ट में बहस करते है।
फिल्म में कोर्ट रूप में उनका मेक अप थोड़ा जवान दिखाता है और बाहर उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा बूढ़ा दिखाया गया है जहां उनकी सांसे उखड़ी हुई और बोलते वक्त सांस की धौकनी चलती है फिल्म में उनका पहला डायलॉग उनके अस्थमा की आवाज़ के कारण मै सुन ही नही पाया।
कुछ पात्र अनावश्यक फिल्म में रखे गए है अमिताभ की पत्नी की भूमिका भी इसी श्रेणी की है जिनके एक दो अस्पताल के सीन है बाद में उनकी तस्वीर पर फूल ही चढ़ते दिखाई दिए।
पिंक में पुलिस का रवैया भी देखने लायक है वो कैसे राजनीतिक दबाव में किसी केस को कैसे बदलती है। हालांकि मीनल की पहली शिकायत वाले सीन को दीपक सिंहल(अमिताभ बच्चन) ने बतौर वकील केस में क्यों इस्तेमाल नही किया ये बात मुझे समझ नही आई आपको आए तो जरूर बताइएगा।
इसके अलावा फिल्म के शुरुवाती कुछ सीन्स में न जाने क्यों अमिताभ बच्चन मास्क लगे स्पाई बने रहते है इसका भी कोई लॉजिक समझ नही आता।
पिंक तकनीकी रूप से एक स्लो फिल्म है जो धीरे धीरे गति पकड़ती है। वकील की भूमिका में  पीयूष मिश्रा ने भी कमाल की एक्टिंग की है।
पिंक महिलाओं से अधिक पुरुषों के देखने लायक फिल्म है बशर्ते वो इससे एक मैसेज़ ग्रहण करें और अपनी लैंगिक सम्वेदनशीलता में इजाफा करें।
देख आइए आप भी। पिंक का रंग हमारी आँखों पर पुते पूवाग्रहों के काले चश्में से मिलाता है चश्मा उतरेगा तो पिंक की खूबसूरती उसके अस्तित्व की सम्पूर्णता और सह अस्तित्व के दर्शन को जीने में साफ़ साफ़ नज़र आएगी।
© डॉ.अजित

Wednesday, August 17, 2016

बर्फी

'बर्फी' महज़ एक फिल्म नही है बल्कि ये एक जज़्बाती दस्तावेज़ है जिसे दिल बार बार पढ़ना चाहता है। बेहद कम संवादों के मध्य फिल्म मन के अंदर इतना कोलाहल भर देती है कि कई बार पलकें भीग जाती है।
झिलमिल और बर्फी का प्यार हो या बर्फी और मिसेज़ सेनगुप्ता का प्यार दोनों में एक चीज़ कॉमन है वो रिश्तों और जज्बातों की पाकीज़गी। कहीं ये शेर पढ़ा था ' ये सदियों की इबादत का सिला होता है,हर किसी की किस्मत में कहां इश्क लिखा होता है' बर्फी की दोनों नायिका इस मामलें में खुशकिस्मत थी कि उन्हें बर्फी का प्यार हासिल हुआ ये अलग बात है कि बर्फी को हासिल करने की हिम्मत झिलमिल के अंदर ज्यादा थी।
'बर्फी' फिल्म की अंदर की दुनिया जितनी खामोश दिखती है दरअसल वो उतनी ही मुखर है और प्रेम की मौन भाषा को समझने के लिए बर्फी एक उम्दा फिल्म है। बर्फी को देखते हुए साँसों से भी खलल पड़ता है ये दर्शक से इस किस्म की नीरवता चाहती है धड़कनों की हलचल से आँख की नमी बहने की जुर्रत रखती है।
रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा की आउटस्टैंडिंग परफॉर्मेन्स है एक्टिंग के मामले में प्रियंका सब पर भारी पड़ी है ऑटिज़्म से पीड़ित लड़की का किरदार क्या कमाल का निभाया है।
बर्फी और झिलमिल दो पतवार की तरह फिल्म में है जो कहीं भी नाव चलाकर उस पार हो जाते है। मिसेज़ सेनगुप्ता का बर्फी को लेकर अनुराग भी अपने आपस एक डिवाइन प्लीजर देता है उनके अंदर की हिम्मत देर से जागती है मगर जब जागती है तो बेपरवाह हो जाती है। यकीनन इश्क ऐसी ही बेपरवाही और जुनून की मांग भी करता है तभी आप इसमें कामिल हो सकते है।
बर्फी का जूता उछाल कर झिलमिल को पुकारना हो या फिर आखिर में झिलमिल का बर्फी को अपने पीछे छिपाना हो दोनों की सीन इश्क की इंतेहा के बेहद जीवंत उदारहण है। फिल्म की एक खासियत यह भी है प्रेम त्रिकोण होने के बावजूद भी फिल्म में तनाव नही है सब कुछ सहज है।
इश्क में साथ जीना और साथ मरना इंसान को वली बना देता है और बर्फी और झिलमिल यकीनन इसके लिए काबिल थे। जो पीछे छूट जाता है वो यादो का कारवां होता है और जो याद करने वाले बच जाते है ये उनकी नियत त्रासदी होती है।
मूक बधिर किरदारों के जरिए बुनी एक क्लासिक प्रेम कथा है बर्फी जब भाषा गौण हो जाती है तब अस्तित्व मुखर हो जाता है फिर वही सहजता भी बसने लगती है। प्यार आदमी को कितना खूबसूरत बना देता है ये बात बर्फी देखकर पता चलती है। इश्क के हिस्से में हमेशा अधूरेपन के किस्से आते है इसलिए मिसेज़ सेनगुप्ता एक अधूरे किस्से की नायिका बन जाती है मगर मेरे ख्याल से उनका अधूरापन भी अपने आप में एक पूर्णता लिए है उनके मन में अंत तक बर्फी के लिए प्रेम उसी संपूर्णता में बना रहता है और वो घर छोड़ते वक्त पल भर के लिए भी नही सोचती कि अब यहां वापसी नही होगी कभी।
हाथ की सबसे छोटी उंगलियों की दोस्ती के जरिए झिलमिल और बर्फी हमें सिखा जाते है कि सबसे गहरे और मजबूत बॉन्ड छोटी छोटी चीज़ों के आपस में अधिकार से जुड़ने से बनतें है। मामूली सी ज़िंदगी की खुशियां आसमां जैसी बड़ी हो सकती है बशर्ते आपके पास सच्चे प्यार करने वाले दोस्त हो ये बात बर्फी देखतें हुए बार बार दिल पर दस्तक देती है।
एक बढ़िया फिल्म जिसको बार बार देखा जा सकता है।

Friday, April 1, 2016

की एंड का

की एंड का : निर्देशक आर बाल्की का एक और मास्टर स्ट्रॉक
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जेंडर की कंडीशनिंग और स्टीरियोटाइप सोच के बीच खुद के अस्तित्व को ईमानदारी से समझनें के लिए की एंड का फ़िल्म मददगार साबित होती है। रिवर्स रोल के विषय पर एक बढ़िया हल्की फुलकी फ़िल्म आर बाल्की ने बनाई हैं।
मेल फीमेल ईगो को जॉब और होम के कॉन्टेक्स्ट में समझनें के लिए फ़िल्म रास्ते सुझाती है। वर्किंग वाइफ और हाउस केयर टेकर हस्बैंड के रिश्ते की महीन बुनावट फ़िल्म की बड़ी यूएसपी है।
जेंडर इक्वेलिटी जैसे सम्वेदनशील विषय को समझनें के लिए ट्रू लव का फ़िल्म में सहारा लिया गया है मगर ह्यूमन बिहेवियर की एक डायनामिक्स के रूप में ईगो और अटेंशन को भी बहुत बढ़िया सिनेमेटिक फॉर्म में दिखाया गया हैं।
फ़िल्म का एक अपना फ्लेवर है बहुत टेंश फ़िल्म कहीं नही होती है हंसाती भी है और खुद की तरफ सवाल करने का हौसला भी दे जाती है। की यानि किया और का यानि कबीर की केमेस्ट्री देख अच्छा लगता है।
की एंड का में टॉय ट्रेन का बढ़िया प्रतीकात्मक प्रयोग किया गया है दो पटरी और एक रेल घर की भावनात्मक संरचना भी लगभग ऐसी ही होती है।
मेल फीमेल की रोल आइडेंटिटी और ईगो फ्रिक्शन को फ़िल्म के जरिए आर पार देखा जा सकता है हालांकि फ़िल्म की केंद्रीय ऊर्जा अंकण्डीशनल लव है इसलिए की और का के लव की रेलगाड़ी कुछ सुनसान स्टेशनों से गुजरती हुई फाइनली अपने डेस्टिशन तक पहुँच ही जाती है।
फ़िल्म का संगीत भी बढ़िया ख्वाहिश है मजबूरी नही गाना मुझे बेहद पसन्द आया उम्मीद है आपको भी आएगा।
यदि थोड़ी फुरसत है तो देख आइए की एंड का अच्छा लगेगा खुद को भी और खुद के अंदर बैठे वाइस वर्सा करेक्टर को भी।

Monday, January 11, 2016

बाजीराव मस्तानी

'बाजीराव मस्तानी' दिल के तहखाने में एक ऐसी सुलगती चिंगारी रख देती है जिसका धुंआ बहुत धीरे धीरे रिसता है मगर जब एक बार इश्क का लोबान जल उठता है तो दिल की हर दीवार सवाली हो जाती है।
इश्क मुरीद और मुराद के बीच बहता एक सूखा दरिया है जहां दीवानगी को साहिल पर खड़े हो देखा नही जा सकता है इश्क के जुनून को जीने के नंगे पाँव उस तपती रेत पर चलना पड़ता है जिसे दिल की सदा के नाम से जाना जाता है।
मस्तानी की धड़कने एक बार बगावत पर क्या आई उसने इश्क को आयत की तरह पढ़ लिया और इबादत की तरह जिया। बाजीराव सच में असली लड़ाका का था वो दो जंग एक साथ हार गया एक अपने दिल की और दूसरी अपनों की।
काशी की कसक मस्तानी की इश्किया ठसक और बाजीराव का किरदार फ़िल्म में इश्क की ऐसी जुगलबंदी सजाती है कि हम अहा, आह और वाह को बारी बारी दोहरातें है।
बाजीराव मस्तानी इश्क में हिम्मत जूनून और पाकीजगी  का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है रूढ़ियों, पूर्वाग्रहों और धर्म के आग्रहों के बीच एक योद्धा के इश्क की बड़ी सीधी सपाट कहानी है।
दिल के हाथों जब रूह मजबूर हो जाती है तब मस्तानी कमली हो बाजीराव की पनाह में आती है जिल्लत के बाद भी उसका यकीन इश्क के पुख्ता होने का ऐसा तावीज़ बनता है जिससे लाख बलाएँ टल सकती है।
बहादुरी और इश्क का जो रिश्ता होता है वही बाजीराव और मस्तानी का है।
संजय लीला भंसाली ने फ़िल्म के कलात्मक पक्ष को इतनी महीनता से गढ़ा कि फ़िल्म देखतें समय हम खुद को मराठा साम्राज्य का एक हिस्सा मानने लगती है। फ़िल्म का फिल्मांकन गजब का मस्तानी दीवानी हो गई गाने में जो सुनहरा पर्दा उन्होंने रचा उसे देख सच में दर्शक मन्त्र मुग्ध हो जाता है। देवदास में पारों और चन्द्रमुखी को तथा बाजीराव मस्तानी में काशी और मस्तानी को एकसाथ नचाने का हुनर केवल भंसाली को ही अता है ये काम केवल वही कर सकते है वो भी बाकमाल।
फ़िल्म का अंत इश्क में मिलनें के लिए तबाह होने का मन्त्र हमारे कान में फूंकता है। इश्क इबादत होने के बावजूद टूटकर जब बिखरता है तब ये बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है।
बाजीराव और मस्तानी फ़िल्म के अंत में कुछ इस तरह से मिलें कि आँखों में धुंधलका छा गया मगर अफ़सोस नही हुआ क्योंकि इससे बेहतर दो इश्कजादों का मिलन हो भी नही सकता था।
काशी का किरदार भी बहुत उम्दा है उसकी आँखों में सतत् बैचेनी देखते हुए भी उसके लिए दुआ और हमदर्दी नही निकलती क्योंकि उस पर हक इश्क में सजदा किए मस्तानी ने बना लिया था।
बाजीराव मस्तानी एक बढ़िया कलात्मक मूल्यों से  भरा हुआ गहरा प्रेम आख्यान है जिसका अंत त्रासद होते हुए भी इश्क के मुरीदों की आँख में पाकीज़ा सूरमा लगा जाता है।

Tuesday, December 1, 2015

तमाशा : एक मनोवैज्ञानिक पक्ष

तमाशा:
'कुछ एक्स्ट्रा शॉट्स' (एक मन ओ' वैज्ञानिक नजर से)

'तमाशा'फ़िल्म के कुछ सीन क्लासिक बन पड़े है इसे डायरेक्टर इम्तियाज़ अली की कलन्दरी ही कहा जाएगा कि उन्होंने फ़िल्म के एक्टर्स से बेहतरीन काम लिया है। शानदार एक्टिंग के दीपिका,रणबीर और पीयूष मिश्रा बधाई के पात्र है।
एक दर्शक की दृष्टि से कुछ सीन पर  मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से कुछ कहना चाहता हूँ। कोरसिका टूर के दौरान दीपिका और रणवीर की मुलाक़ात होती है साथ खाते पीते घुमते है एक सीन में जंगल में बहती नदी तक पहूंचते है रणवीर औंधे मुंह लेट कर जानवरों की माफिक नदी से पानी पीते है ठीक ऐसा ही दीपिका भी करती है ये सीन अर्जित व्यवहार की मुक्ति और नैसर्गिक होने के सुख की लाजवाब अभिव्यक्ति है पानी के अंदर मुंह डालकर बुलबुले निकालना चित्त की बेफिक्र मनोदशा को बताती है जहां अर्जित व्यवहार की तार्किकता को छोड़कर अपने मन की बेवजह बातों को करने का सुख दिखता है जीवन दरअसल ऐसे ही जीवन्त लम्हों में सांस लेता है अन्यथा तो हम सब लोकाचार से दबा जीवन ही जीतें हैं।
एक दुसरे सीन जब दीपिका और रणवीर अपनी दैहिक सीमाओं का जिक्र कर 'टच'को डिफाइन करते है और मर्यादाओं के बीच में सांस लेती शुद्ध सम्वेदना को रेखांकित करते है वहां विश्वास और आंतरिक शुचिता सर्वोपरी और मुखर दिखाई देती है वहां एक दूसरे के गले लगना और आश्वस्ति से आँखें मूँद लेना मन के विस्तार और पारस्परिक स्नेह और विश्वास की यात्रा तय करता है वहां उन लम्हों को जीने की बैचेनी दोनों के अंदर साफ़ देखी जा सकती है। जब मन का सम्वाद सीधा मन से होता है तब वहां देह गौण हो जाती है और स्पर्श एक दुसरे की रूह पर मरहम लगाती है तथा लम्बी उड़ान के लिए हमारे हौसलें की गाल पर एक चिकोटी काट लेती है ताकि होश बरकरार रहें।
एक दुसरे सीन में जब दीपिका को अचानक भारत लौटनें होता है वो रणवीर से बिन मिलें लौटने का फैसला करती है मगर होटल की सीढ़ियों से वापिस रणवीर के रूम में जाती है फिर कभी न मिलनें की बात करके अपने साथ सुखद स्मृतियों का बोझ लेकर कार में बैठती है उस  समय उसकी आँखें ज़बां हो जाती है गीली आँखों और चेहरें के भाव से विलग होने की पीड़ा को इतनी ख़ूबसूरती से दीपिका ने बयां किया है कि वहां मौन अभिनय मुखर होकर सामने आता है अनुराग की दहलीज़ पर जब बिछड़न की सवारी आ खड़ी होती है तब अहसासों के छूटने और टूटने का एक बढ़िया कोलाज़ दीपिका के उस कार के सीन ने बनाया है।
भारत में लौटकर दीपिका का अनमना मन देखना निसन्देह सुखप्रद लगता है क्योंकि बतौर दर्शक हम चाहतें है कि वो रणबीर को कुछ इसी तरह से याद करें उसकी बैचेनियों में हमारे खोए किस्सों का आलाप भी शामिल हो जाता है।
दिल्ली एअरपोर्ट उतर कर दीपिका का चलनें अंदाज़ साफ़ बताता है कि उसके पास रणवीर को तलाश करने का आत्मविश्वास था। 'सोशल' पर जब वो रणबीर को देखती है और उससे मिलनें जाती है घुमावदार सीढ़ियों पर दो बार उतरना फिर वापिस चढ़ना ये एक क्लासिक शॉट उन पर फिल्माया गया है यह मन के द्वन्द और उत्साह की एक खूबसूरत प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति दिखाई देती है जहां दिल हां और ना की लड़ाई से गुजर रहा होता है क्योंकि रणबीर से मिलना जहां एक तरफ वादाखिलाफी है वही ये मुलाक़ात अनुराग की चासनी में डूबी एक रूह की जरूरत भी है।
और मैं उस क्लासिक सीन का जिक्र जरूर करूँगा जो इस फ़िल्म की सबसे बड़ी यूएसपी मुझे लगा।
इस सीन में दीपिका रणवीर से माफी मांगती है और अपनी अपेक्षा टूटने की बात को अप्रासंगिक बताती है वो रणवीर को एक प्रेमी के रूप में नही एक अस्तित्व के रूप में स्वीकार करती है उसे लगता है किसी भी अस्तित्व के 'काम्प्लेक्स' को टच करना उसे अस्त व्यस्त कर सकता है। यहां वो प्रेम का अनकंडीशनल होना भी समझती है प्रेम कभी इमेज़ से नही किया जा सकता है बल्कि प्रेम आपकी ग्राह्यता का विस्तार कर देता है मगर इस सीन में रणबीर के व्यक्तित्व की जटिलता का भी बड़ा खूबसूरत चित्रण किया गया है उसकी तात्कालिक 'स्प्लिट पर्सनेलिटी' और दीपिका के प्यार की जुम्बिश दोनों के अंतरद्वन्द का बेहद महीन चित्रण किया गया है। दोनों में मन में अथाह प्रेम भी है और गुस्सा भी दोनों ही आत्मदोष से पीड़ित है साथ रणवीर के मन दीपिका की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की खीझ भी शामिल है। दीपिका यहाँ ईगो के विस्तार का प्रतीक बनकर उभरी है व्यापक अर्थो में रणबीर का ही सुपर ईगो है दीपिका चाहती है कि अपने प्रेम की पुकार से वो रणवीर के मन पर इड (id) की पकड़ को थोड़ा ढीला कर सके। उसके पास अधिकार है करुणा है और विनय युक्त प्रेम यहां प्रेम एक रिहेबिलेसन का एक प्रमुख टूल बन जाता है वो माफी मांग रणवीर के इगो को सम्भालती है साथ उसे अपनी और खींच कर लगे लगा उसे अंतर्द्वन्द से मुक्त करने की एक ईमानदार कोशिश करती है उसकी आँखों में आँसू है मगर दिल में एक आत्मविश्वास भी है कि उसकी उपस्थिति रणबीर के बिखरे वजूद को इकट्ठा कर देगी। रणबीर के अंतर्द्वन्द कहीं अधिक गहरे है वो एक बार समर्पित होता तो दुसरे पल उसकी गिल्ट और ईगो विद्रोह करती है। मेज पर गाल टिका एक दुसरे को विपरीत कोण से देखना दो चेतनाओं के विस्मय का खूबसूरत चित्रण दिखता है। इसी सीन के विस्तार में रणबीर के जाने पर दीपिका उसको खोजती बिरहन सी जब गलियों में भटकती है और अंत में उसे देख स्ट्रीट में घुटनों के बल बैठ जाती है यह सीन अंतिम प्रयास या प्रार्थना के पलों में अंतिम स्वर के शामिल होने जैसा है जहां छूटते अतीत हो पकड़ने की जिजीविषा और प्रेम की गहराई में ईगोलेस कन्डीशन की उपस्थिति साफ़ दिखाई देती है वहां ऐसा लगता है कि  अनुराग चिंता और पीड़ा एक साथ घुटने के बल बैठ गई है मगर यहाँ यह बेबसी पराजय की नही बल्कि प्रेम के विस्तार की प्रतीक लगती है।
और अंत में कहानी सुनाने वाले बाबा (पीयूष मिश्रा) से जब रणबीर बड़ा होकर मिलता है तो उसका 'एनलाइटमेंट' होता है बाबा की एक झिड़क उसके मन की जड़ता को तोड़ती है कि बाहर क्या जवाब ढूंढ रहा है सब कुछ तेरे अंदर ही है सवाल भी और जवाब भी। इम्तियाज़ अली ने बाबा का किरदार बड़ा ही अबस्ट्रेक्ट गढ़ा है दरअसल बाबा हमारा ही इनर सेल्फ है उससे जब एक बढ़िया डायलॉग स्थापित हो जाता है तब समस्त शंकाओं के उत्तर हमें खुद ब खुद मिल जातें है फ़िल्म में कहानी बाहर की दुनिया का प्रतीक है और जिसका तमाशा खुद के अंदर चलता है। प्रेम के जरिए ये फ़िल्म खुद के अंदर चल रहे तमाशे को देखनें का एक बढ़िया अवसर हमें उपलब्ध कराती है।

(कुछ-कुछ सीन का जिक्र करके फ़िल्म की कुछ कहानी शेयर करने का दोषी हूँ उसके लिए अग्रिम माफी मगर इन सीन की छाप मेरे दिल ओ जेहन पर इतनी गहरी थी कि खुद को लिखने से रोक न सका। मैंने रणबीर और दीपिका का नाम इसलिए भी लिखा है क्योंकि दोनों असल जिंदगी में प्रेमी रह चुकें है बाकि दुनिया यहां उन्हें वेद और तारा ही समझें किरदार बदलतें है कहानी हमेशा एक ही रहती है। शुक्रिया !)

© डॉ. अजित

Monday, November 30, 2015

तमाशा

तमाशा: एक यात्रा खुद का सच जाननें की।
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इम्तियाज़ अली इस पीढी के सबसे अधिक संभावनाशील और बेहतरीन निर्देशकों मे से एक है महज़ उनके भरोसे फिल्म देखी जा सकती है अभी तक वो खरे ही उतरे है। ‘तमाशा’ भी मानव मनोविज्ञान को समझनें की एक ईमानदार कोशिश है। तमाशा शब्द अपने आप में चमत्कृत करता है तमाशा में कौतुहल के साथ रहस्य का अनावरण करने की एक स्वाभाविक जिज्ञासा हमारे अन्दर होती है। फिल्म का मूल प्रश्न दार्शनिक है और उस प्रश्न के जवाब तलाशने की कोशिश विशुद्ध मनोवैज्ञानिक है। फिल्म देखतें हुए हम खुद के प्रति ईमानदार होते जाते है और उसी ईमानदारी से खुद से यह सवाल करने लगते है कि आखिर मेरा सच क्या है? फिल्म की यही सबसे बडी सफलता है। यह फिल्म कोई कोरा गल्प नही है बल्कि हमारे अस्तित्व की जटिलताओं की कहानी है जिसें हम खुद बाह्य दबावों के चलते बुनते चले जाते हैं।
वेद ( रणबीर कपूर) और तारा ( दीपिका पादुकोण) की प्रेम कहानी एक आम प्रेम कहानी नही है बल्कि ये कहानी खुद की तरफ लौटने के साहस और खुद के सच जानने की पडताल में घायल होते वजूद की कहानी है। फिल्म का ट्रीटमेंट थोडा अलग है यह पर्सनेलिटि डेवलेपमेंट में परिवेशीय हस्तक्षेप और पेरेंटिंग की भूमिका को भी अपने यूनीक ढंग से रेखांकित करती है। स्टोरी टेलर बाबा (पीयूष मिश्रा) हमारी कलेक्टिव कांशिएसनेस का प्रतीक बनें है जो कहानी हम सुनतें आएं है वो हमारे व्यक्तित्व को किस प्रकार से प्रभावित करती है फिल्म में यह बडी खूबसूरती से दिखाया गया है। देश,काल और परिस्थितियों में केवल कहानियां बदलती है मूल किरदार नही और हम उसी किरदार में नायकतत्व खोजते है जो हमारे अस्तित्व के सबसे करीब होता है।
‘तमाशा’ स्मृतियों का आख्यान है जिसमें प्रेम के बडे महीन प्रभाव दिखाए गए है जब आप प्रेम में होते है तो खुद के सबसे ज्यादा करीब होते है वो खुद को समझने के लिए प्रेम से बेहतर और कोई अवस्था हो भी नही सकती है। फिल्म दर्शकों के सामने एक बडा मासूम सवाल रखती है कि आप जो है क्या आप वो सच में है या फिर आपका परिवेश,परिवार आपको वैसा देखना चाहता है इसलिए आप वैसे है। इस सवाल के जवाब की तलाश में हमें खुद की तलाशी लेनी होती है जिसमें तमाशा अच्छी तरह से मददगार है।
वेद और तारा का प्रेम दो चेतनाओं का आंतरिक संवाद है जब जब उसमे बाह्य पक्ष इनवॉल्व होता है तब-तब असुविधा या बाधा उत्पन्न होती है। अपनी मूल प्रकृति के साथ जीने का सुख ही हमें जीवन को सहजता से जीने का अभ्यास सिखा सकता है यह फिल्म हमें बताती है।
बिना परिचय के मिलना ठीक ऐसा है जैसे दो अस्तित्व अपने मूल के साथ शुद्धतम रूप मे एक दूसरे से मुखातिब हो दूर देश में वेद और तारा कुछ इसी तरह से मिलते है जुडने का वादा करके भी आखिर जुडते है। फिल्म में प्रेम का एक डायनामिक्स ठहराव और धैर्य भी है वहाँ आरोपण नही है बल्कि एक दूसरे के जीवन में खुद की मुक्त अवस्था में बने रहने की एक ईमानदारी भरी कोशिश है। प्रेम कैसे आपको रुपातंरित कर देता है फिल्म इस पर एक नोट हमें पढाती है। वेद और तारा की प्री एंड पोस्ट कैमेस्ट्री देख आपके चेहरे पर मुस्कान और बैचेनी एक साथ पसरती जाती है।
यदि आप खुद से सवाल करने की हिम्मत रखते है और ईमानदारी से उसका जवाब भी देना चाहते है तो निसन्देह तमाशा आपकी मदद करती है। फिल्म का संगीत और लोकेशन दोनो बढिया है कुछ-कुछ हिस्सों में फिल्म कमजोर भी पडी है मगर जब आप एक बार तमाशा देखना शुरु कर देते है तो फिर वो आपको बांध भी लेती है। मुझे व्यक्तिगत रुप से फिल्म का वो सीन सबसे दमदार लगा जब तारा वेद को रोकने के लिए गले से लगाती है और रिंग वापिस मांगती है दीपिका के महस इस सीन के लिए तमाशा देखी जा सकती है बाकि फिल्म तो बढिया है ही।

Wednesday, July 1, 2015

हमारी अधूरी कहानी


हमारी अधूरी कहानी :

इस फिल्म को आधी अधूरी कहानी के सहारे प्रेम की पवित्रता को कहने समझने या दिखाने की एक कोशिस कहा जा सकता है. फिल्म कुछ कुछ टुकड़ो में अच्छी लगती है तो कुछ जगह जाकर उलझी हुई लगने लगती है.फिल्म को लेकर  मोहित सूरी खुद ही उलझे हुए लगते है ऐसे में बतौर निर्देशक वो ठीक ढंग से बता नही पाये कि प्यार को जीने के लिए दिल कि सुननी पड़ती है. अमूर्त रूप से प्रेम इतना व्यापक विषय है कि इस पर कोई एक टीका पूरी कही भी नही जा सकती है. फिल्म में वसुधा (विद्या बालन) केंद्रीय भूमिका है मगर उनके किरदार को इतना डिप्रेसिव गढ़ा गया है कि वो फिल्म में थकी हुई और बेहद निस्तेज नजर आई है हालांकि उनकी एक्टिंग बहुत बढ़िया है  मेरे हिसाब से दूसरी बड़ी भूल फिल्म में उनके अपोजिट इमरान हाशमी का होना है इमरान हाशमी इस तरह के किरदार के साथ न्याय नही कर पाते है उनका अलग किस्म का दर्शक वर्ग भले ही हो मगर इस फिल्म थोड़ा और गहरा अभिनेता चुनना चाहिए था फिल्म में मुझे उनका न रोना और न हंसना ही प्रभावशाली लगा उनकी डायलोग डिलिवरी भी बेहद कमजोर है. फिल्म में विद्या के पति का किरदार निभा रहे है राजकुमार  राव का काम जरूर बढ़िया लगा मुझे वो नेचुरल एक्टर है मगर इंटरवल तक दर्शक यह तय नही कर पाता है कि उनके चरित्र को किस रूप में एक्सेप्ट करें.
फिल्म में दो गाने जरूर दमदार है एक टाइटल सांग है तथा दूसरा एक कव्वाली कि टोन लिए एक सैड सांग है मेरे लिए ये दोनों गाने देखकर ही फिल्म के पैसे वसूल हो गए है.
हमारी अधूरी कहानी दरअसल खुद को  रूह कि रौशनी को महसूस करने और उसके मुताबिक अपनी ज़िंदगी जीने का फलसफा सिखाती फिल्म है साथ ही बड़ी साफगोई से यह भी बताती है कि सच्ची प्रेम कहानियाँ अक्सर अधूरी ही रहती है शायद उनकी पूर्णता लोक से परे की चीज़ है. पारिवारिक दबाव और थोपे गए संस्कारो कि जकड़न में खुद को स्वाहा करने से बेहतर कि जिंदगी को नई रोशनी से जीने की कोशिस की जाए. फिल्म का एक डायलोग बढ़िया है कि हम किसी दुसरे को तभी प्यार कर पाते है जब हम खुद से प्यार करना छोड देते है यही फिल्म का सेंट्रल आईडिया भी है. किसी का गम बाँट लीजिये उसके बाद आप अपने आसपास बिखरे प्यार को खुद महसूस करने लगेंगे.
हमारी अधूरी कहानी उन लोगो को जरूर देखनी चाहिए जो नियतिवादी होकर कथित रूप से  जीने का कौशल सीख गए है मगर फिर भी अक्सर शिकायत करते पाये जाते है इस फिल्म को देखकर दिल कि सुनने और दिल के मुताबिक़ जीने का हौसला जरूर हासिल होगा. अधूरापन मनुष्य के अस्तित्व का अनिवार्य हिस्सा है मगर यदि आप जिंदगी के किसी मोड़ पर खुशबु को देख ठहर जाए या किसी पल में जीने लगे तो समझिए कि उस अधूरेपन का एक टुकड़ा अपना एकांत भरने के लिए आपकी एक प्यार भरी नजर के इंतज़ार में है.
फिल्म का अंत दुखांत दिखता जरूर है मगर सच में अधूरी प्रेम कहानियों का वो सच्चा सुखान्त है.
बहुत नैतिकता सही गलत कि मुक़दमे में फंसे लोगो को यह फिल्म एक जिरह के बाद रिहाई के नुक्ते सीखा सकती है साथ ही कुछ लोग जानते समझते हुए भी इसे नजरअंदाज कर सकते है क्योंकि ये उस दुनिया का किस्सा सुनाती है जहां जाने का दिल तो सबका करता है मगर दिमाग अक्सर हाथ पकड़ रोक लेता है.
और अंत में फिल्म में पुलिस अफसर पाटिल के रूप में नरेंद्र झा के काम कि तारीफ़ भी बनती है उनका रोल छोटा है मगर बढ़िया काम किया है.

Thursday, June 11, 2015

दिल धड़कनें दो

'दिल धड़कनें दो'
: एक दर्शकीय टिप्पणी

दिल तो वैसे चौबीसों घंटे धड़कता ही रहता है मगर निर्देशक जोया अख़्तर की यह फ़िल्म देखकर दिल की धड़कनों को गिनने का हुनर मिलता है बशर्ते आप मुहब्बत और आजादी की बेचैनियों को जाननें के सच्चे तलबगार हो।
यह फ़िल्म अभिजात्य/कुलीन वर्ग के लोगों की जिन्दगी में पसरें खामोश सन्नाटे और रिश्तों के बुनावट की महीन पड़ताल करती है फ़िल्म का मूल कथानक मानवीय सम्बन्धों की जटिलता और उसमें सम्वाद स्नेह की आवश्यकता को केंद्र में रखकर बुना गया है। फ़िल्म हमें बताती है कि जब दिल से हम कोई फैसला कर लेते है तो दिमाग उसको पूरा करनें की तरकीब निकाल ही लेता है।
एक हाई प्रोफाइल बिजनेस मैन की जिंदगी बाहर से जितनी हसीन और रंगीन नजर आती है अंदर से वो कितने स्तर के द्वन्द और शून्यता से भरी हो सकती है फ़िल्म को देखकर पता चलता है। पति-पत्नी,भाई-बहन, दोस्त-प्रेमी जैसे रिश्तों अपने आदर्श रूप में कैसा होना चाहिए फ़िल्म इसी की स्थापना करती नजर आती है।
प्यार मनुष्य की बुनियादी जरूरत है और इस प्यार को जीने या महसूस करने के लिए एक कान अपने दिल के हवाले करना पड़ता है। रिश्तों में नयापन बचाकर रखनें के लिए सम्वाद कितना अनिवार्य सूत्र होता है यह फ़िल्म देखते हुए अहसास होता है।
दिल धड़कने दो मूलतः मनुष्य के स्वतन्त्र अस्तित्व को जीने अनुभूत करनें तथा अपने सच को स्वीकर कर उसके अनुरूप जीने का कौशल सिखाने वाली फ़िल्म है। जोया अख़्तर ने फ़िल्म में क्रूज़ की यात्रा को कहानी बढ़ाने के लिए एक प्रतीक के रूप में बेहतर चुना है क्योंकि इस फ़िल्म मानवीय सम्बंधों में प्रेम के मूल्य और वैयक्तिक स्वतन्त्रता की यात्रा को देखनें समझनें का नजरिया देती है।
फ़िल्म कही पर कभी अनकहे गाम्भीर्यता का शिकार नही होती है किरदारों के जिंदगी में पसरें तनाव के बीच हास्य के हलके फुलके पल भी गूंथे हुए है इसलिए फ़िल्म समानांतर रूप से हंसाती भी है और आपको किरदारों को समझनें का मौका भी देती है।
सभी कलाकारों का अभिनय बेहद बढ़िया है अनुष्का शर्मा और फरहान अख़्तर की भूमिका अपेक्षाकृत छोटी है मगर दोनों का काम दमदार है। रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा फ़िल्म के केंद्र में है। अनिल कपूर का नया आउटलुक प्रभावित करता है अभिनेता तो वो मंझे हुए है इसमें दो राय नही है।
रणवीर की मम्मी की भूमिका में शैफाली शाह आउटस्टैंडिंग लगी है। फ़िल्म में शैफाली मुझे व्यक्तिगत रूप से काफी खूबसूरत और प्रभावी नजर आई।
और अंत में प्लूटो का जिक्र जरूर करूँगा उसके बिना फ़िल्म अधूरी वो फ़िल्म का नैरेटर ही नही बल्कि मानव व्यवहार की जटिलता की व्याख्या करनें वाला दार्शनिक भी है। उसका नाम फ़िल्म के लिहाज़ से एकदम उपयुक्त है। यदि आप चाहतें है कि अपने दिल को यूं ही बेतरतीब धड़कनें दिया जाए और उसकी बेचैनियों की गिरह को थोड़ा ढीला करना चाहतें है तो यह फ़िल्म जरूर देखिए शायद अपनी धड़कनों का सुगम संगीत आप भी सुन सकें।

© डॉ.अजित 

Friday, May 8, 2015

पीकू

'पीकू' :भविष्य से बात करती एक संवेदनशील फ़िल्म
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सिनेमाई दर्शकों का कस्बाई या शहरी चरित्र भलें ही फंतासी को अधिक पसन्द करता हो उसके लिए मनोरंजन का खालिस अर्थ एक्शन,थ्रिल,कॉमेडी हो मगर फिर भी पीकू जैसी संवेदनशील फ़िल्म का बनना इस बात का संकेत है कि भले ही जोखिम हो मगर आज भी सिनेमा के जरिए अर्थपूर्ण विषयों पर संवाद करने का हौसला कुछ निर्माता निर्देशक रखते है।
'पीकू' कहानी है पिता-पुत्री के सम्वेदनशील रिश्तें की जहां बेटी की भूमिका के इतनें शेड्स है कि पिता पुत्री के रिश्तें की गहराई और संवेदना अंतर्मन को छू जाती है।
भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन) और पीकू ( दीपिका पादुकोण) की कहानी धीरे धीरे गति पकड़ती है मगर जब एक बार आप फ़िल्म से कनेक्ट हो जाते है फिर उसके बाद आप फ़िल्म के पात्रों में खुद को तलाशनें लगतें है।
क्रोनिक कब्ज़ से पीड़ित पिता की मनोवैज्ञानिक स्थिति और उसके साथ समायोजन की समस्या का बड़ी सूक्ष्मता से फ़िल्म में चित्रण किया गया है। इस बंगाली फैमली के जरिए हम बंगाली परिवारों में स्त्री के लोकतांत्रिक अधिकारों और जीवनशैली में कुलीनता को भी देख समझ पातें हैं।
फ़िल्म का मूल कथानक भले ही उम्रदराज़ पिता के रहनें वाली बेटी के रोजमर्रा के संघर्ष के इर्द गिर्द बुना गया है मगर यह फ़िल्म सिंगल पेरेंट फैमली में पली पीकू के एकांत का एक अनकहा आख्यान भी है। पीकू इस फ़िल्म में दोस्त,बेटी,मां,प्रेमिका जैसी कई ज़िंदगियाँ जीने वाली नायिका है।
पीकू के लिए बूढ़ा और बीमार पिता (कब्ज को लेकर काफी हद तक मनोवैज्ञानिक भी) महज एक जिम्मेदारी नही है बल्कि एक जीवन के साथ घुली हुई कहानी है जिसकी खीझ भरी बातों पर जितना वो चिल्लाती है उतना ही उसके गहरे पिता प्रेम का भी पता चलता है।
पीकू में इरफ़ान खान (राणा चौधरी) का करेक्टर भी बेहद सुलझा हुआ है टैक्सी सर्विस ऑनर होने के बावजूद वो एक लम्बी यात्रा पर बतौर ड्राईवर पीकू और भास्कर बैनर्जी के साथ निकलता है उसकी बातें,सलाह और इमोशन्स सब बेहद गज़ब और महीन किस्म की है।
पीकू के पिता भास्कर बैनर्जी को मोशन की प्रॉब्लम है और मोशन इमोशन से जुड़ा होता है यह बात फ़िल्म का सेंट्रल आईडिया है मनोवैज्ञानिक लिहाज़ से फ़िल्म में कब्ज़ एक प्रतीक भर है कब्ज़ का अर्थ है एक पिता के ढलती उम्र के साथ की असुरक्षाऐं है जो अपनी तयशुदा मौत का इन्तजार करते हर एक बुजुर्ग की असुरक्षाएं है जिस दिन भास्कर उस ग्रंथि से मुक्त हो जाता है उस दिन उसका मोशन भी क्लियर हो जाता है और उसकी यात्रा भी पूर्ण हो जाती है।
फ़िल्म के अपने सूक्ष्म समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अर्थ है जिसके जरिए वो सिंगल पेरेंट फैमली के बुजुर्ग की मनस्थिति का बेहद भावपूर्ण चित्रण करती नजर आती है। पीकू का फ़िल्म में यह डायलॉग कि एक ख़ास उम्र के बाद पेरेंट्स खुद जिन्दा नही रह पातें है उन्हें जिन्दा रखना पड़ता है फ़िल्म का सारतत्व बयां करता है।
इरफ़ान खान,दीपिका,अमिताभ तीनों की एक्टिंग बेहतरीन है कई क्लोज़ कैमरा सीन में एक्सप्रेशन के मामलें में दीपिका बेहद क्लासिक लगी है। इरफ़ान और दीपिका की बड़ी एब्सट्रैक्ट किस्म की केमेस्ट्री फ़िल्म में दिखाई गई है।
डॉ श्रीवास्तव के रोल में रघुवीर यादव और मौसी के रोल में मौसमी चैटर्जी ने भी बढ़िया काम किया है। फ़िल्म में एक दो बढ़िया सोलो सांग भी है जो सुकून देते है।
पेरेंट्स की केयर और उनकी आदतों के साथ जीने की कला सिखनें के लिए यह एक बेहद जरूरी फ़िल्म है।यदि आपके साथ पेरेंट्स रहतें है या भविष्य में कभी रहेंगे तो आपको यह फ़िल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए। यह फ़िल्म बेहद काम आएगी यह मेरी समझ कहती है।

Tuesday, April 21, 2015

डेढ़ इश्किया

शुरुवात में डेढ इश्किया देखने का तजरबा किसी मुशायरे में शिरकत करने से जैसा है यह विशाल भारद्वाज की ही कलंदरी है कि विशुद्ध व्यवसायिक फिल्म में भी वें ऊर्दू अदब की खुशबू इतने से करीने से रखते है कि दिल बाग-बाग हो जाता है मल्टी प्लेक्स में फिल्म शुरु होने के थोडी ही देर बाद शेर औ शायरी का ऐसा शमां बंधता है कि दर्शको की वाह-वाह से ऐसा लगने लगता है कि हम सिनेमा हॉल मे न होकर किसी मुशायरे में शिरकत फरमा है। फिल्म के कई सीन्स में हमारे दौर के हकीकत के शायर जैसे अनवर जलालपुरी साहब,डॉ नवाज़ देवबन्दी साहब को देखना मेरे जैसे ऊर्दू अदब के मुरीद के लिए बेहद सुकून भरा रहा है...डॉ.नवाज़ देवबन्दी साहब का शेर हो या डॉ बशीर बद्र के शेर से अनवर जलालपुरी साहब का महफिल का आगाज हो एकदम से फिल्म में ऊर्दू अदब का अहसास दिल को राहत देता है हाँ हो सकता है फिल्म का ऐसा कलेवर कुछ कम ही लोगो को पसन्द आये लेकिन मुझे बेहद पसन्द आया है जिस तरह से विशाल भारद्वाज़ ने असल के शायर को फिल्म मे शामिल किया है वह काबिल-ए-तारीफ है और अभी तक मैने और किसी फिल्म में अभी तक देखा भी नही है। फिल्म से मेरे जुडने की एक वजह यह भी हो सकती है कि फिल्म के डायलॉग पर पश्चिमी यूपी की बोली का प्रभाव है अरशद वारसी का खालिस बिजनौरी लहज़े में डायलॉग बोलना खुद ब खुद फिल्म से जोड देता है फिल्म में लखनवी अदब और ऊर्दू जबान का वकार भी है साथ दो ठग/चोर के रुप में अरशद वारसी और नसीरुद्दीन साहब का बिजनौरी स्टाईल भी...। विशाल भारद्वाज़ के चुस्त डायलॉग निसन्देह मुझे बेहद पसन्द आये मै उनके इस फन का मुरीद हो गया हूँ। फिल्म में दो हसीन अभिनेत्रियां दोनो ही मुझे बेहद पसंद है और बेगम पारा के रोल में तो माधुरी दीक्षित का हुस्न गजब का रुहानी अहसास लिए है उनकी अदा,हरकते,भाव भंगिमाएं और अभिनय सबके सब कमाल के है वो बेगम पारा के रोल को जिस उरुज तक ले गई यह उन्ही के बस की बात थी कोई और अभिनेत्री शायद ऐसा न कर पाती। हुमा कुरेशी मुझे निजि तौर पर दो वजह से पसन्द है एक तो उनकी लम्बाई और दूसरी उनकी बेइंतेहा खुबसूरती उनके चेहरे मे कस्बाई लुक है वह अपने मुहल्ले की सबसे खुबसूरत लडकी जैसी लगती है इसलिए हुमा कुरेशी का फिल्म में मुनिया का रोल फिल्म की जरुरत बनता चला जाता है। नसीर साहब के अभिनय पर मै क्या तब्सरा करुँ इतनी मेरी हैसियत नही है वो लिविंग लीजेंड है लेकिन उनके अलावा अरशद वारसी की एक्टिंग की भी तारीफ बनती है और सबसे अधिक मुझे प्रभावित किया नकली नवाब की भूमिका में विजय राज साहब नें नसीरुद्दीन साहब के साथ कई सीन्स में उनका नैचुरल एक्टिंग और कम्फर्ट उनका भी मुरीद बना देता है।
फिल्म के दो बडी कमजोरी मुझे नजर आई एक तो फिल्म का अंत जरुरत से अधिक नाटकीयता लिए है और जल्दी से हजम होने वाला नही है दूसरा हमरी अटरिया पे आजा सांवरिया गीत फिल्म के अंत के बाद शुरु होता है जब तक दर्शक उठकर चलने लगते है मै इस गीत में माधुरी के डांस और नाट्यशास्त्र के लिहाज़ मुद्राएं देखने के लिए भी प्रेरित होकर फिल्म देखने गया था जो आधे-अधूरे मन से ही पूरा हो पाया हालांकि मै अंत तक सीट पर जमा रहा शायद एक दो और माधुरी के ऐसे मुरीद थे जो बैठे थे लेकिन दर्शको के जाने के क्रम मे गीत का मजा किरकिरा हो जाता है।
फिल्म समीक्षकों और सिनेमा के जानकार बुद्धिवादी दर्शको के लिहाज से डेढ इश्किया को भले ही डेढ स्टार भी न मिलें मै बिना इसकी परवाह इस फिल्म को विशाल भारद्वाव की एक उम्दा फिल्म करार देता हूँ और हाँ पिछली इश्किया से मुझे यह डेढ इश्किया ज्यादा पसन्द आयी...कोई आग्रह नही है ना ही मै कोई फिल्म समीक्षक हूँ सिनेमा का दर्शक होने के नाते फिल्म देखने के बाद जैसा मैने महसूस किया लिख दिया इसे फिल्म देखने की अनुशंसा जैसा भी न समझा जाए कहीं फिर आप बाद मे उलाहना दें क्योंकि डेढ इश्किया को महसूस करने के लिए दिल का डेढ होना बेहद जरुरी है।