Monday, November 30, 2015

तमाशा

तमाशा: एक यात्रा खुद का सच जाननें की।
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इम्तियाज़ अली इस पीढी के सबसे अधिक संभावनाशील और बेहतरीन निर्देशकों मे से एक है महज़ उनके भरोसे फिल्म देखी जा सकती है अभी तक वो खरे ही उतरे है। ‘तमाशा’ भी मानव मनोविज्ञान को समझनें की एक ईमानदार कोशिश है। तमाशा शब्द अपने आप में चमत्कृत करता है तमाशा में कौतुहल के साथ रहस्य का अनावरण करने की एक स्वाभाविक जिज्ञासा हमारे अन्दर होती है। फिल्म का मूल प्रश्न दार्शनिक है और उस प्रश्न के जवाब तलाशने की कोशिश विशुद्ध मनोवैज्ञानिक है। फिल्म देखतें हुए हम खुद के प्रति ईमानदार होते जाते है और उसी ईमानदारी से खुद से यह सवाल करने लगते है कि आखिर मेरा सच क्या है? फिल्म की यही सबसे बडी सफलता है। यह फिल्म कोई कोरा गल्प नही है बल्कि हमारे अस्तित्व की जटिलताओं की कहानी है जिसें हम खुद बाह्य दबावों के चलते बुनते चले जाते हैं।
वेद ( रणबीर कपूर) और तारा ( दीपिका पादुकोण) की प्रेम कहानी एक आम प्रेम कहानी नही है बल्कि ये कहानी खुद की तरफ लौटने के साहस और खुद के सच जानने की पडताल में घायल होते वजूद की कहानी है। फिल्म का ट्रीटमेंट थोडा अलग है यह पर्सनेलिटि डेवलेपमेंट में परिवेशीय हस्तक्षेप और पेरेंटिंग की भूमिका को भी अपने यूनीक ढंग से रेखांकित करती है। स्टोरी टेलर बाबा (पीयूष मिश्रा) हमारी कलेक्टिव कांशिएसनेस का प्रतीक बनें है जो कहानी हम सुनतें आएं है वो हमारे व्यक्तित्व को किस प्रकार से प्रभावित करती है फिल्म में यह बडी खूबसूरती से दिखाया गया है। देश,काल और परिस्थितियों में केवल कहानियां बदलती है मूल किरदार नही और हम उसी किरदार में नायकतत्व खोजते है जो हमारे अस्तित्व के सबसे करीब होता है।
‘तमाशा’ स्मृतियों का आख्यान है जिसमें प्रेम के बडे महीन प्रभाव दिखाए गए है जब आप प्रेम में होते है तो खुद के सबसे ज्यादा करीब होते है वो खुद को समझने के लिए प्रेम से बेहतर और कोई अवस्था हो भी नही सकती है। फिल्म दर्शकों के सामने एक बडा मासूम सवाल रखती है कि आप जो है क्या आप वो सच में है या फिर आपका परिवेश,परिवार आपको वैसा देखना चाहता है इसलिए आप वैसे है। इस सवाल के जवाब की तलाश में हमें खुद की तलाशी लेनी होती है जिसमें तमाशा अच्छी तरह से मददगार है।
वेद और तारा का प्रेम दो चेतनाओं का आंतरिक संवाद है जब जब उसमे बाह्य पक्ष इनवॉल्व होता है तब-तब असुविधा या बाधा उत्पन्न होती है। अपनी मूल प्रकृति के साथ जीने का सुख ही हमें जीवन को सहजता से जीने का अभ्यास सिखा सकता है यह फिल्म हमें बताती है।
बिना परिचय के मिलना ठीक ऐसा है जैसे दो अस्तित्व अपने मूल के साथ शुद्धतम रूप मे एक दूसरे से मुखातिब हो दूर देश में वेद और तारा कुछ इसी तरह से मिलते है जुडने का वादा करके भी आखिर जुडते है। फिल्म में प्रेम का एक डायनामिक्स ठहराव और धैर्य भी है वहाँ आरोपण नही है बल्कि एक दूसरे के जीवन में खुद की मुक्त अवस्था में बने रहने की एक ईमानदारी भरी कोशिश है। प्रेम कैसे आपको रुपातंरित कर देता है फिल्म इस पर एक नोट हमें पढाती है। वेद और तारा की प्री एंड पोस्ट कैमेस्ट्री देख आपके चेहरे पर मुस्कान और बैचेनी एक साथ पसरती जाती है।
यदि आप खुद से सवाल करने की हिम्मत रखते है और ईमानदारी से उसका जवाब भी देना चाहते है तो निसन्देह तमाशा आपकी मदद करती है। फिल्म का संगीत और लोकेशन दोनो बढिया है कुछ-कुछ हिस्सों में फिल्म कमजोर भी पडी है मगर जब आप एक बार तमाशा देखना शुरु कर देते है तो फिर वो आपको बांध भी लेती है। मुझे व्यक्तिगत रुप से फिल्म का वो सीन सबसे दमदार लगा जब तारा वेद को रोकने के लिए गले से लगाती है और रिंग वापिस मांगती है दीपिका के महस इस सीन के लिए तमाशा देखी जा सकती है बाकि फिल्म तो बढिया है ही।

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