Monday, March 23, 2015

NH 10

एन एच 10

:एक सफर जो खत्म नही होता

हाई वे बड़े शहरों को आपस में जोड़तें है ऐसा कहते है सब मगर ये फ़िल्म हाई वे और महानगरों के बीच बसे देहात के बीहड़ और उसके टूटे बिखरे हुए समाजशास्त्रीय सच की कहानी हैं। टेबलॉयड और गूगल के सहारे हिन्दुस्तान को जानने के एक महानगरीय सांस्थानिक सच का बेहद अस्त व्यस्त कर देने वाला दस्तावेज है यह फ़िल्म है।
फ़िल्म रात में शुरू होती है और रात में ही खत्म। यहां रात महज़ दिन के छिपने का प्रतीक नही है बल्कि यहाँ रात उस कड़वे यथार्थ का प्रतीक है जो हमारे आसपास बिखरा पड़ा है। वैसे तो फ़िल्म ऑनर किलिंग की घटना से गति पकड़ती है परन्तु इसके बाद की कहानी में जो बदलाव आतें है वो दिल की धड़कनों को बढ़ा देते है। इंटरवल तक फ़िल्म आपके द्वन्द और तनाव को उस शिखर तक ले जाती है कि आप कभी नाख़ून कुतर कर तो कभी सीट पर पसर खुद को सामान्य करने की कवायद करने लगते है।
फ़िल्म महानगरों के अवैध सन्तान के रूप में जीते देहात के कड़वे सामाजिक यथार्थ की कहानी है और इसका कथानक इतना कसा हुआ है कि आप थोड़ी ही देर में फ़िल्म का हिस्सा बन मीरा और अर्जुन के लिए प्रार्थना करना शुरू कर देतें हैं।
ऑनर किलिंग जितनी समाजशास्त्रीय समस्या है उतनी ही मनोवैज्ञानिक भी। फ़िल्म में कुछ दृश्य विचलित करने वाले है। लॉ एंड आर्डर के बीच बेख़ौफ़ सांस लेते एक कड़वें सामाजिक सच को फ़िल्म बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
दिल्ली गुड़गाँव की महानगरीय जीवनशैली जीनें वाला एक युगल जब इस बर्बर दुनिया से रूबरू होता है तब उसको यथार्थ और कल्पना के अंतर का पता चलता है। मीरा का बर्थ डे सेलीब्रेट करने के लिए एक प्राइवेट विला को बुक कर अर्जुन दिल्ली के आउटर एरिया में क्या निकलता है उसकी दुनिया ही बदल जाती है एक बाईपास उन दोनों की दुनिया को उस रास्ते पर खड़ा कर देता है जहां जीने के लिए भागना और भागने के लिए जीना जरूरी हो जाता है।
यह कहानी महज हरियाणा के गाँव से ही नही जुडी है बल्कि इस कहानी में खाप पंचायत के सिस्टम में जीते उस हर गाँव की कहानी है जहां जाति और गोत्र सबसे बड़ा सामाजिक सच हैं। जहां प्रेम विवाह आज भी गुनाह है इसलिए भौगोलिक रूप से ये दिल्ली से सटे हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देहात की कहानी कहा जाए तो अतियुक्ति न होगी।
फ़िल्म बताती है कि ऑनर किलिंग समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक रूप से इतना जटिल मुद्दा है कि इसमें स्त्री के स्वाभाविक वात्सल्य की भी हत्या हो जाती है फ़िल्म में दीप्ति नवल को देख मुझे गाँव की चौधरन याद आई जो इस मसलें पर पुरुषों के साथ ही खड़ी होती है।
एन एच 10 एक त्रासद सच की कथा है इसमें एक शहरी युगल उस परिवेश से रूबरू होने की कहानी है जहां प्रतिष्ठा के नाम पर लॉ एंड आर्डर की कोई हैसियत नही बच जाती हैं। फ़िल्म एक दृश्य में पुलिस अधिकारी मीरा (अनुष्का शर्मा) को जाति व्यवस्था का पाठ पढ़ाता है मनु और अम्बेडकर का उदाहरण देता है साथ ही यह भी पता चलता है कि जाति का मनोवैज्ञानिक सच वर्दी के पीछे भी वैसे ही ज़िंदा रहता है जैसे गाँव के अंदर ये एक गर्व से भरी व्यवस्था जीवित है।
अनुष्का की एक्टिंग आउटस्टैंडिंग है। वो फ़िल्म की प्रोड्यूसर भी है इस फ़िल्म को बनाकर उन्होंने एक बढ़िया काम किया है उद्देश्य भले ही व्यावसायिक हो मगर इसके पीछे एक सोशल कन्सर्न भी जुड़ा नजर आता है।
फ़िल्म के सम्वाद में देशज और भदेस पुट है जो फ़िल्म की सम्प्रेषणशीलता को बढ़ा देती है। सभी का अभिनय काबिल ए तारीफ़ है। फ़िल्म में देहात के मनोरंजन का साधन रहें सांग का भी एक दृश्य है जो बेहद जीवन्त किस्म का है जिससे पता चलता है कि फ़िल्म की पटकथा पर पर्याप्त शोध किया गया है।
एक ज्वलंत विषय पर बनाई गई एक बेहतरीन फ़िल्म है एन एच 10 आप एक बार इस हाई वे पर जब रात को सफर पर निकलतें है सुबह होने के इन्तजार में पलक झपकना भूल जातें है फ़िल्म सवाल खड़े करती है जिसके जवाब हमें खुद तय करने होंगे जिसके लिए यह सफर बेहद जरूरी हो जाता है।

© डॉ.अजीत

(लिखना और भी व्यापक सन्दर्भों के साथ चाहता था मगर मोबाइल से टाइप करने की अपनी सीमाएं है उम्मीद करता हूँ आप तक बात सही पहूंच गई होगी ध्यान रहें मैं कोई फ़िल्म समीक्षक नही हूँ बस सिनेमा का एक ईमानदार दर्शक भर हूँ)


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